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________________ अध्याय : पांचवां ] [ ४५३ जिसकी उपमा परमेष्ठी के सुख को दी जाय; श्रर्थात् उनका सुख निरुपमेय हैं । चरस्थिरार्थ सम्पूर्ण मृगमा जगत्रये । उपमानोपमेयत्व मन्ये स्वस्यैव स स्वयम् ॥ ११४० ॥ आचार्य कहते हैं कि यदि चर और स्थिर पदार्थों से भरे हुए इन तीनों जगतों में उपमेय और उपमान ढूंढा जाय तो मैं ऐसा मानता हूँ कि वे स्वयं ही उपभान उपमेय रूप हैं । भावार्थ सिद्ध भगवान् का उपमान सिद्ध ही है और किसी के साथ उसकी उपमा नहीं दी जा सकती । यतोऽनन्त गुणानां स्यादनन्तां शोपि कस्यचित् । ततो न शक्यते कतु तेन साम्यं जगत्रये ॥११४१ ॥ क्योंकि तीनों जगत में उन सिद्ध परमेष्ठी के अनन्त गुणों का अनन्तवां ग्रंश भी किसी पदार्थ में नहीं है, इसलिये उनकी समानता किसी के साथ नहीं कर सकते । भावार्थ - इसलिये उनका उपमान उपमेय भाव अपना अपने ही साथ है । शक्यते न यथा ज्ञातुं पर्यन्तं व्योम कालयोः । तथा स्वभाव जातानां गुणानां परमेष्ठिनः ।। ११४२ ।। जैसे कोई आकाश और काल का श्रन्त नहीं जान सकता, उसी तरह स्वभाव से उत्पन्न हुए परमेष्ठी के गुणों का अन्त भी कोई नहीं जान सकता । गगनघन पतङ्गाहोन्द्र चन्द्रा चलेन्द्र, क्षिति दहन समीराम्भोधिकल्पद्र मारणाम् । freeमपि समस्तं निन्त्यमानं गुरणानां परम् regentinपमानत्वमेति ।।११४३ ॥ श्राकाश, मेघ, सूर्य, सर्पो का इन्द्र, चन्द्रमा, मेरु, पृथ्वी, अग्नि, वायु, समुद्र और कल्पवृक्षों के गुणों का समस्त समूह भी चिन्तवन किया जाय तो भी उनकी उपमा परम गुरु श्री सिद्ध परमेष्ठी के साथ नहीं हो सकती । भावार्थ-संसार में उत्तमोतम पदार्थों के गुण विचार करने से भी ऐसा कोई पदार्थ नहीं दिखता जिसके गुणों की उपमा सिद्ध परमेष्ठी के गुणों के साथ दी जाय । नासत्पूर्वाश्च पूर्वा मो निर्विशेष विकारजा: । स्वाभाविक विशेषा हाभूत पूर्वाश्व तद्गुणाः ।।११४४।। सिद्ध परमेष्ठी के गुण पूर्व में नहीं थे, ऐसे नहीं हैं अर्थात् पूर्व में भी शक्ति
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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