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[ गो. प्र. चिन्तामणि रूप से विद्यमान ही थे, क्योंकि असत् का प्रादुर्भाव नहीं होता यह नियम है; यदि असत् का भी प्रादुर्भाव माना जाय तो शशशृग का भी प्रादुर्भाव होना चाहिये, किंतु होता नहीं है; यही इस नियम में प्रमाण है और पूर्व में व्यक्त नहीं थे तथा विशेष विकार से उत्पन्न नहीं, किन्तु स्वभाविक हैं (इस प्रकार पूर्वार्द्ध द्वारा निषेध मुख कथन करके, इस विषय को पुनः उत्तरार्द्ध द्वारा विधि मुख वाक्य से कहते हैं कि सिद्ध परमेष्ठि के गुण स्वाभाविक विशेष अर्थात् पूर्व में भी शक्ति की अपेक्षा स्वभाव में ही विद्यमान और अभूतपूर्व अर्थात् पूर्व में व्यक्त नहीं हुए ऐसे हैं । भावार्थ-प्रात्मा के जो स्वाभाविक गुण हैं, पूर्वावस्था में अव्यक्त रहते हैं, वे ही सिद्धावस्था में व्यक्त हो जाते हैं; और पूर्व में व्यक्त नहीं थे, इससे पूर्व में थे' ऐसा भी नहीं कह सकते; और स्वाभाविक होने के कारण उनको विकारज भी नहीं सकते, किंतु वे शक्ति (मुख) की अपेक्षा स्वाभाविक और व्यक्ति की अपेक्षा अभूतपूर्व ही कहे जाते हैं।
वाक्पथातीत महात्म्य मनन्त ज्ञान वैभवम् । सिद्धात्मना गुणग्रामं सर्वज्ञ ज्ञानं गोचरम् ॥११४५।।
जिसका महात्म्य वचनों से कहने योग्य नहीं है और जिसके अनन्त ज्ञान का विभव है, ऐसे सिद्ध परमेष्ठी के गुणों का समूह सर्वज्ञ के ज्ञान के गोचर है ।
स स्वयं यदि सर्वशः सम्यग् ते समाहितः। तथाप्येति न पर्यन्तं गुणानां परमेष्ठिनः ॥११४६।।
सर्वज्ञदेव परमेष्ठी के मुरणों को जानते हैं, परन्तु यदि वे उन गुरणों को समाधान सहित अच्छी तरह कहें तो वे भी उनका पार पा नहीं सकेंगे।
भावार्थ---बचन की संख्या अल्प है और गुरण अनन्त हैं, इसलिये वे वचनों से नहीं कहे जा सकते ।
त्रैलोक्य तिलकोभूतं निःशेष विषयच्युतम् । निर्द्वन्दं नित्यमत्यक्षं स्वादिष्टं स्वस्वभावजम् ।।११४७॥ निरौपम्यमविच्छिन्नं स देवः परमेश्वरः । तयास्ते स्थिरीभूतः पिबन् ज्ञान सुखामृतम् ।।११४०।।
श्री सिद्ध परमेष्ठी परमेश्वर देव समस्त त्रैलोक्य का तिलक स्वरूप, समस्त विषयों से रहित, निर्द्वन्द अर्थात् प्रतिपक्षी रहित, अविनाशी, अतीन्द्रिय, स्वादस्वरूप, अपमे स्वभाव से ही उत्पन्न, उपमा रहित और विच्छेद रहित ज्ञान और सुख रूपी
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