________________
अध्याय : पांचवां ]
[ ४५५ अमृत को पीते हुए स्थिरीभूत तीन लोक के शिखर पर विराजमान रहते हैं ।
देवः सोऽनन्तवीर्यो दृगवगम सुखानध्यरत्नावकीर्णः, श्री मात्रैलोक्यचिन प्रतिवसति भवध्वान्तविध्वंस भानुः । स्थात्मोत्थानन्त नित्य प्रवर शिव सुधाम्भोधिमग्नः स देवः, सिद्धात्मा निर्विकल्पोऽप्रतिहत महिमा शश्ववानन्दधामा ।।११४६।।
जिनके अनन्त वीर्य हैं, अर्थात् प्राप्त स्वभाव से कभी व्युत नहीं होते, जो दर्शनज्ञान और सुख रूप अमूल्य रत्नों सहित हैं, जो संसार रूप अन्धकार को दूर कर सूर्य के समान विराजमान है, जो अपने आत्मा से ही उत्पन्न ऐसे अनन्त नित्य उत्कृष्ट शिवसुख रूपी अमृत के समुद्र में सदा मग्न हैं, विकल्प रहित हैं, जिनकी महिमा अप्रतिहत (जो किसी से पाहत न होवे) है और जो निरन्तर प्रानन्द के निवास स्थान हैं, ऐसे श्री सिद्ध परमेष्ठी देव शोभायमान जो तीनों लोकों का मस्तक (शिखर) हैं, उसमें सदा निवास करते हैं।
इति कतिपय वर वर्णेनिफलं कोतितं समासेन । निःशेषं यदि वक्तुं प्रभवति देवः स्वयं वीरः ।।११५०॥
ऐसे पूर्वोक्त प्रकार कितने ही श्रेष्ठ अक्षरों के द्वारा संक्षेप से ध्यान का फल कहा है। इसका समस्त फल कहने को स्वयं श्री वर्धमान स्वामी ही समर्थ हो सकते हैं ।
(प्रा. शुभचन्द्र स्वामी, ज्ञानाच) इस प्रकार के ध्यानों को करके जीव अगर चरमशरीरी है तो मोक्षपद प्राप्त कर लेता है और चरमशरीरी नहीं है, तो देवत्व, कल्पवासी देवादिक में उत्पन्न होकर फिर मनुष्य पर्याय पाकर मोक्ष जाता है ।
पा जाता हर योगी चार माराधना की सिद्धि कैसे करें?
संस्कारातिशयः प्रसन्न हृदयस्त्यागौ क्षमी प्रोद्यमी, प्रध्यक्त स्व पर स्थितिः शुभवचोरत्नावली राजिसः । शूरः शील परी गुरपस्थिर रुचिर्मव्योऽभिमानी परं, साध्वीं साधयति स्वभाव सुभपामाराधना नायिकाम् ॥११५.१॥ .
उत्तम संस्कार बाला, प्रसन्न हृदय वाला, समस्त परिग्रह का त्यागी, क्षमावान, प्रात्मपुरुषार्थी, प्रत्यक्त है, स्व पर स्थिति जिसकी, शुभ वचन बोलने वाला, सम्यग्दर्शनादि रत्नों से शोभित, शूरवीर, शीलवान्, गुरणों में स्थिर रुचि रखने वाला, भव्य,..