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________________ ४५६ [ गो. प्र. चिन्तामणि स्वाभिमानी मानस ही केवल स्वभाव से मान्य प्रशंसनीय सिद्धि की प्राप्त कराने वाली आराधना को साधता है। शेषेऽल्ये निज जीवने जन हितं देशं महीशान्यितं, माना जनजनास्पदं सुख पदं सत्संगिनां योगिनाम् । संप्राप्यात्म मनोगतं बहुमत सम्यधिवेध स्थितः, सूरिभ्यः सकलैश्च तः सुविधिसः संघान्वितैः स्वीकृतः ॥११५२१ मेरी प्रायु अल्प है, ऐसा जानकर यतिराज जनता का हित करने वाले राजा से शोभित, नाना जन लोगों से भरे हुये, सत्पुरुष योगिजनों के रहने का स्थान ऐसे देश में जाकर बहुजनों के द्वारा माननीय अपने मनोगत विचारों को प्राचार्य के समक्ष भली प्रकार से निवेदन करता है । तदनन्तर सकल संघ के द्वारा स्वीकृत किया जाता है। प्राचार्यः परिचर्ययाऽऽहिताहितः सत्यून पंचाशता, द्वाभ्यां वातिजघन्यतः परिवृतः प्रीत्योत्तमार्थाय॑तः । पालोच्याऽस्मकृतं कृती त्रिकरणशेष विशुद्धाशयः, श्रृत्वातः प्रवरं प्रतिकरणमध्यारा सत्संस्तरम् ।।११५३।। प्राशोऽसौ फमशोऽशनं. परिहन्नेकैकमास्वायत, त्सम्यग्दशितमिष्ट मिष्ट मसकृकांक्षाक्षयार्थ बुधः । हित्वाऽतस्त्रिविधाशनं धृतिकरं कि स्तोकमेतन्मया, भुक्तात्पूर्वमनेकमेरुमहतो मे तृप्तिकस्येत्यतः ॥११५४ त्यक्त्वाऽतः कुशलः क्रमेण विविधं धीरः समाध्याप्तये, पान सिक्थयुतं विलेपि सरसं निःस्नेह मच्छं पयः । कि तृप्ति वतीयतो भवभवे पोलादजातेत्यतो, नानानीरिधि नोरतोऽतिमहतो मे कर्मधर्मासिनः ॥११५५।। ज्ञाताऽऽस्वाद समस्त वस्तु भिरलं याहयरसारैः परं, जैनेन्द्र वचनामृतं जननमृत्यातक नाशोति तत् । धृत्वा पंचगुरुन्मनस्य विचलं तन्मन्त्रमुच्चाश्यन्, धम्य शुक्लमपि प्रकृष्ट फलदं ध्यायंस्तनु व्युत्सृजेत् ।।११५६।। उत्कृष्ट अड़तालीस और जघन्य दो आचार्य (साधु) जिसकी प्रीति से परिचर्या करते हैं तथा विशुद्ध प्राशक्वाला क्षपक पुण्यात्मक उत्तमार्थ के लिये अपने manane AN anemHIमाजantram - .. - - र
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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