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________________ it. =n अध्याय : पांचवां } [ ४५७ ininema = - - - HISTHARATD.DA- S - 4A mins दोषों को मन दचन काय से पालोचना करे तथा उत्तमार्थ प्रतिक्रमण सुन कर समीचीन संस्तर पर प्रारूढ हो, अर्थात् सल्लेखना धारण करे । तदनन्तर पाहार की कांक्षा को क्षय करने के लिये बुद्धिमान प्राचार्य के द्वारा बार-बार दिखाये गये इष्ट और स्वाद युक्त आहार का एक-एक प्रास्वादन करके प्रशन का त्याग करे । तदनन्तर अहो मैंने पूर्व में बहुत पदार्थों का भरण किया है, अब तक उनसे तप्ति नहीं हुई तो इस स्तोक पदार्थों से क्या तृप्ति हो सकती है, कदापि नहीं, ऐसा विचार कर क्षपक खाद्य और लेह्य इन पदार्थों का त्याग कर देता है । तदन्तर कर्म रूपी ताप से दुःखी मेरी प्यास समुद्रों के पानी पीने से शांत नहीं हुई तो क्या ? इस अल्प पेय से मेरी तृप्ति हो सकती है? कदापि नहीं हो सकती, ऐसा विचार कर क्रमश: दूध, छाछ, स्वच्छ पानी का भी.त्याग करता है । जिसने वस्तु का स्वरूप मान लिया है, अनादि काल से अनुभूत दृष्ट, श्रुत बाह्य वस्तुओं से क्या प्रयोजन हैं ? बाद्य पदार्थों का संयोग ही दुःख दायक है, इस प्रकार की भावनामों से पवित्रात्मा, क्षपक, जन्म, जरा, मृत्यु के नाशक जैनेन्द्र भगवान के वचनरूपी अमृत का पानकर और पंच परमेष्ठी को अविचल रूप से मन में धारण करता हुआ तथा पंचपरमेष्ठी याचक मन्त्र को बचन से उच्चारण करता हुना उत्तम स्वर्म और मोक्ष फल को देने वाले धर्मध्यान और शुक्लध्यान में लीन होता हुआ शरीर को छोड़े। देवस्तिर्यग चेतनश्च भनुजः प्राप्तोप सर्गस्तदा . ध्यक्त्वाऽऽहार शरीर संगमखिलं बाधाऽविरामावधि । सावा सकलं च निर्मल मना ध्याने प्रशस्ते स्थित, स्तिष्ठत्वं च गुरुमभिमत फल प्राप्त्यभ्यु पायानपि ॥११५७।। देवकृत, तिर्यंचकृत, मानवकृत और अचेतन कृत उपसर्म के आ जाने पर, जब तक उपसर्ग दूर न हो तब तक अखिल आहार, परिग्रह और सकल सावध का त्याग करके योगीगरण अभिमत फल के प्राप्ति के कारणभूत पंच परमेष्ठी का निर्मल चित से चितवन करते हुये धर्मध्यान और शुक्ल ध्यान में स्थिर होवे ।। इंगिन्यां चान्य संपादितहित विरतौ वरिणतोयोऽत्र भक्त, प्रत्याख्याने कमोऽसौ मिरलिशयमृतौ स्वोपकार प्रवृतौ।.. जेयः प्रायोपगत्यां स्वपरहित कृत्त्यतयांच्छाप्रवृती : ताभिः सप्लाष्ट जन्म स्वपमतदुरितां मोक्षलक्ष्मी लभन्ते ॥११५८।। -munannge..PRINFRAJAST nanewwe.IME
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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