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। गो. प्र. चिन्तामणि जब यह ज्ञान हो जाय कि अब मेरा जीवन अल्प है, तब क्रम से अन्न का त्याग, दूध आदि स्निग्ध पदार्थों का त्याग, तदनन्तर समस्त पाहार का त्याग किया जाता है । शरीर की वैय्यावृत्ति का त्याग नहीं किया जाता है, वह भक्त प्रत्याख्यान मरण है । उसका उत्कृष्ट काल बारह वर्ष है, जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है । और जिसमें श्राहार पानी के त्याग के साथ अपने शरीर की बैश्यावृत्ति भी दूसरों से नहीं कराता है, वह इंगिनी मरण है । जिस संन्यास में अपने शरीर की बैय्यावृत्ति दूसरे से भी नहीं कराता है और अपने हाथों से भी नहीं करता है, केवल ध्यान में मग्न रहता है, उसको प्रायोपगमन प्रत्याख्यान कहते हैं । आहार पानी के त्याग की विधि तीनों में समान है, इन तीनों प्रकार के संन्यासपूर्वक मरण करने वाला यतिराज सात आठ भव में निश्चय से मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है।
दीक्षामावाय शिक्षामथ गणधरता रक्षणार्थ गणस्य, संस्कार स्वस्य भावः शमदमविभवयोऽत्र संल्लेखना च । कोधादीनां विधाय प्रथितपथुयशाः साधयेवुत्तमाथ, सः स्यात्सद्भव्य सस्योत्पल निकर मुदं मेधचन्द्रो मुनीन्द्रः ॥११५६॥
प्रथम दीक्षा शिक्षा और गरम की रक्षा के लिये प्राचार्य पद को धारण करके विख्यात यश का धारी मुनिराज तदनन्तर अपने समता इन्द्रिय मन आदि विभवों के द्वारा क्रोधादि कषायों के संस्कार को कृश कर करके उत्तमार्थ को सिद्ध करते हैं। वह मुनि भव्य जोवरूपी धान्य के लिए मेघ और भव्य कमलों के लिए चन्द्रमा के समान होते हैं। आराधना का विशेष स्वरूप भगवती आराधना से जानना ।
(वीरमन्दीस्वामी, प्राचारसार) पुलाक, बकुश, कुशील, निग्रन्थ, स्नातक, इन पांच प्रकार के मुनियों का स्वरूप
पुलाक बकुश कुशील निर्ग्रन्थ स्नातकाः निर्ग्रन्थाः ।
पुलाक-जो उत्तर गुरणों की भावना से रहित हो और जिनके मलमणों में भी कभी-कभी दोष लग जाते हों, उन्हें पुलाक कहते हैं। पुलाक का अर्थ है, मल...
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