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________________ Hindemon अध्याय : पांचवां ] { ४५६ सहित तण्डूल । पुलाक के समान कुछ दोष सहित होने से मुनियों को पुलाक कहते हैं। बकुश---जो मुलगुरगों का निदोष पालन करते हों, लेकिन शरीर और उपकरणों से शोभा बढ़ाने की इच्छा रखते हैं । और परिवार में मोह रखते हैं, उनको बकुश कहते हैं । बकुश का अर्थ हैं, शवल (चितकबरा) । कुशील–के दो भेद हैं - प्रतिसेवना कुशील और कषाय कुशील । जो उपकरण तथा शरीर अदि से पूर्ण विरक्त न हो तथा जो मूल और उत्तर गुणों का निर्दोष पालन करते हैं, लेकिन जिनके उत्तर गुणों की कभी-कभी विराधना हो जाती हो, उनको प्रतिसेवना कुशील कहते हैं । कषाय कुशाल--- अन्ध कषायों को जोत लेने के कारण केवल संज्वलन कवाय का ही उदय हो, उनको कषाय कुशील कहते हैं । निर्गन्य-जिस प्रकार जल में लकड़ी की रेखा अप्रकट रहती है। उसी प्रकार जिनके कर्मों का उदय अप्रकट हो और जिनको अन्तमुहूर्त में केवल झान उत्पन्न होने वाला हो, उनको निम्रन्थ कहते हैं । स्नातक-घातिया कर्मों का नाश करने वाले केवली भगवान् को स्नातक कहते हैं। यद्यपि चारित्र के तारतम्य के कारण इनमें भेद पाया जाता है, लेकिन लेगम आदि नय की अपेक्षा से इन पांचों प्रकार के साधुओं को निर्ग्रन्थ कहते हैं । पुलाक आदि मुनियों में विशेषता__ संयम श्रत प्रतिसेवना तीर्थ लिङ्ग लेश्योपपाद स्थान विकल्पतः साध्याः। संयम, श्रुत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिङ्ग, लेश्या, उपपाद और स्थान इन आठ अनुयोगों के द्वारा पुलाक आदि मुनियों में परस्पर विशेषता पाई जाती है । पलाक, बकुश और प्रतिसेवना कुशील इन मुनियों के सामायिक और छेदोपस्थापना चारित्र होते हैं । कषाय कुशील के यथाख्यात चारित्र को छोड़कर अन्य चार चारित्र, होते हैं । निर्ग्रन्थ और स्नातक के यथाख्यात चारित्र होता है। उत्कृष्ट से पुलाक, बकुश और प्रतिसेवना कुशील मुनि अभिन्नाक्षर दश पूर्व
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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