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________________ ४६० ] [ मो. प्र. चिन्तामरिण के ज्ञाता होते हैं । श्रभिन्नाक्षर का अर्थ - जो एक भी अक्षर से न्यून न हो । अर्थात् उक्त मुनि दश पूर्व के पूर्ण ज्ञाता होते हैं । कषाय कुशील और निर्ग्रन्थ चौदह पूर्व के ज्ञाता होते हैं । जघन्य से पुलाक प्रचार शास्त्र का निरूपण करते हैं । बकुश, कुशील और निर्ग्रन्थ आठ प्रवचन मातृकाओं का निरूपण करते हैं। पाँच समिति और तीन गुप्तियों को ग्राठ प्रवचन मातृका कहते हैं । स्नातकों के केवलज्ञान होता है, श्रुत नहीं होता । व्रतों में दोष लगने को प्रतिसेवना कहते हैं । पुलाक के पाँच महाव्रतों और रात्रि भोजन त्याग व्रत में विराधना होती है। दूसरे के उपरोध से किसी एक व्रत की प्रतिसेवना होती है । अर्थात् वह एक व्रत का त्याग कर देता है | प्रश्न – रात्रि भोजन त्याग में विराधना कैसे होती है ? उत्तर---इसके द्वारा श्रावक आदि का उपकार होगा ऐसा विचार कर लाक मुनि विद्यार्थी प्रादि को रात्रि में भोजन कराकर, रात्रि भोजन त्याग व्रत का . विराधक होता है । बकुश के दो भेद - उपकरण बकुश और शरीर बकुश । उपकरण बकुश नाना प्रकार के संस्कार युक्त उपकरणों को चाहता है । शरीर बकुश अपने शरीर में तेल मर्दन यादि संस्कारों को करता है, वही दोनों की प्रतिसेवना है। प्रतिसेवना कुशील मूलगुणों की विराधना नहीं करता है । किन्तु उत्तर गुणों की विराधना कभी करता है, इसकी यही प्रतिसेवना है । . कषाय कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक के प्रतिसेवना नहीं होती है। ये पांचों प्रकार के मुनि, सब तीर्थकरों के समय में होते हैं । लिङ्ग के दो भेद हैं- द्रव्य लिङ्ग और भाव लिङ्ग पांचों प्रकार के मुनियों में भाव लिङ्ग समान रूप से पाया जाता है । द्रव्य लिङ्ग की अपेक्षा उनमें निम्न प्रकार से भेद पाया जाता है कम्बल आदि वस्त्रों को ग्रहण कर और न फट जाने पर सीते हैं, तथा कुछ शरीर में विकार उत्पन्न होने से लज्जा के कोई असमर्थ मुनि शीतकाल आदि में लेते हैं, लेकिन उस वस्त्र को न धोते हैं समय बाद उनको छोड़ देते हैं । कोई मुनि
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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