________________
अध्याय : पांचवां ]
[ ४६१
कारण वस्त्रों को ग्रहरण कर लेते हैं । इस प्रकार का व्याख्यान भगवती आराधना में अपवाद रूप से बतलाया है । इसी आधार को मानकार कुछ लोग मुनियों में सचलता (वस्त्र पहनना ) मानते हैं। लेकिन ऐसा मानना ठीक नहीं है । कभी किसी मुनि का वस्त्र धारण कर लेना तो केवल अपवाद है, उत्सर्ग मार्ग को अचेलकता ही हैं, श्री वही साक्षात् मोक्ष का कारण होती है । उपकरण कुशील मुनि को अपेक्षा अपवाद मार्ग का व्याख्यान किया गया है, अर्थात् उपकरण कुशील मुनि कदाचित अपवाद मार्ग पर चलते हैं ।
पुलाक के पीत, पद्म और शुक्ल, ये तीन लेश्याएँ होती हैं । बकुश और प्रतिसेवना कुशील के छहों लेश्यायें होती हैं ।
प्रश्न :- बकुश और प्रतिसेवना कुशील के कृष्ण, नील और कापोत ये तीन लेश्याएँ कैसे होती हैं ?
उत्तर :--- पुलाक के उपकरणों में आसक्ति होने से और प्रतिसेवना कुशील' के उत्तर गुणों में विराधना होने के कारण कभी प्रार्त्तध्यान हो सकता है | अतः ध्यान होने से आदि की तीन लेश्याओं का होना भी संभव है। पुलाक
ध्यान का कोई कारण न होने से अन्त की तीन लेश्याएँ ही होती हैं । कषाय कुशील के अन्त की चार लेश्याएँ ही होती हैं । कषाय कुशील के संज्वलन कषाय का उदय होने से कापोत लेश्या होती है । निर्यन्थ और स्नातक के केवल शुक्ल लेश्या ही होती है । प्रयोग केवली के होस्या नहीं होती है ।
उत्कृष्ट से पुल का अठारह सागर की स्थिति वाले सहस्त्रार स्वर्ग के देवों में उत्पाद होता है । बकुश और प्रतिसेवना कुशील का बाईस सागर की स्थिति वाले प्रारण और प्रच्युत स्वर्ग के देवों में उत्पात होता है । कषाय कुशील और निर्व्रन्थों का तैतीस सागर की स्थिति वाले सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के देवों में होता है । स्नातक का उपपाद मोक्ष में होता है ।
स्थान असंख्यात है । पुलाक और वे दोनों एक साथ
होते हैं । छोड़ देता है, पुनः कषाय
ear के निमित्त से होने वाले संयम कषाय कुशील के सर्व जघन्य असंख्यात संयम स्थान 'असंख्यात स्थानों तक जाते हैं, बाद में पुलाक साथ ..कुशील अकेला ही प्रसंख्यात स्थानों तक जाता है
।
इसके बाद कषाय कुशील प्रतिसेवना