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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि - कुशील और बकुश, एक साथ असंख्यात स्थानों तक जाते हैं, बाद में बकुश साथ छोड़ देता है। और असंख्यात स्थान जाने के बाद प्रतिसेका सुशील भी साथ छोड़ देता है । पुनः असंख्यात स्थान जाने के बाद कषाय कुशील की भी निवृत्ति हो जाती है । इसके बाद निर्ग्रन्थ असंख्यात अकषाय निमित्तक संयम स्थानों तक जाता है, और बाद में उसकी भी निवृत्ति हो जाती है । इसके अनन्तर एक संयम स्थान तक जाने के बाद स्नातक को निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है । स्नातक की संयम लब्धि अनन्त गुणी होती है । (तत्त्वार्थवृति प्र. ह सूत्र नं. ४७-४८) ORA COWNIAMYM WOOVVISSE BØRSTE ___ कषायों से प्राकुलित होकर जीव दुखी हो रहा है । क्षयोपशमरूप इन्द्रियों से तो इच्छा पूर्ण होती नहीं है, इसलिए मोह के निमित्त से इन्द्रियों को अपने-अपने विषय ग्रहण की निरन्तर इच्छा होती ही रहती है, उससे पाकुलित होकर दुःखी हो रहा है । ऐसा दुःखी हो रहा है कि किसी एक विषय के ग्रहण के अर्थ अपने मरण को भी नहीं गिनता है। जैसे हाथी को कषट की हथिनी का शरीर स्पर्श करने की, मच्छ को बंशी में लगा हुआ मांस का स्वाद लेने की, भ्रमर को कमल-सुगन्ध सूघने की, पतंगे को दीपक का वर्ण देखने की, और हिरण को राग सुनने की इच्छा ऐसी होती है कि तत्काल मरना भासित हो तथापि मरण को नहीं गिनते । विषयों का ग्रहण करने पर, उसके मरण होता था, विषय सेवन नहीं करने पर इन्द्रियों की पीड़ा अधिक भासित होती है । इन इन्द्रियों की पीड़ा से पीडितरूप सर्व जीव निविचार होकर जैसे कोई दुःखी पर्वत से गिर पड़े वैसे ही विषयों में छलांग लगाते हैं। नाना कष्ट से धन उत्पन्न करते हैं, उसे विषय के अर्थ खोते हैं तथा विषयों के अर्थ जहाँ मरण होना जानते हैं, वहाँ भी जाते हैं । नरकादि के कारण जो हिंसादिक कार्य है, उन्हें करते हैं, E तथा क्रोधादि कषायों को उत्पन्न करते हैं। Sanaa wana DABODAASAUNAWAAD DA ANADANAMANDADADADabas ANAAAAAAAAAAAAADBaada
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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