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________________ अध्याय छठा : शेष गुणस्थानों का वर्णन प्रश्न :--अप्रमत्त गुणस्थान का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-सज्वलन और नो कषाय के मद उदय से प्रमाद रहित संयम परिणाम को अप्रमत्त विरत गुणस्थान कहते हैं। प्रश्न :-अप्रमत गुरणस्थान के कितने भेद हैं ? . उत्तर :-दो हैं-~- स्वस्थान अप्रमत्तविरत और सातिशय अप्रमत्तविरत । प्रश्न :-स्वस्थान या निरतिशय अप्रमत्त विरत किसे कहते हैं ? उसर : --हजारों बार छठे से सातवें में और सातवे से छठे गुणस्थान में आने जाने रूप परिणाम को स्वस्थानअप्रमत्त विरत कहते हैं। प्रश्न :-- सातिशय या (परस्थान) अप्रमत्त विरत गुरणस्थान का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- जो श्रेणी चढ्ने के सन्मुख होता है, उसे सातिशय अप्रमत्त विरस कहते हैं। प्रश्न :-श्रेणी चढ़ने का पान कौन होता है ? उत्तर :-क्षायिक सभ्यग्दृष्टि और द्वितीयोपशम सम्यक् दृष्टि हो श्रेणी चढ़ते हैं । प्रथमोपशम सम्यक्त्व वाला तथा क्षायोपशगिक सम्यकत्व वाला श्रेणी नहीं चढ़ सकता । प्रथमोपशम सम्यकत्व बाला प्रथमोपशम सम्यकत्व को छोड़कर क्षायोपशमिक सम्यक् दृष्टि होकर प्रथम ही अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ का विसंयोजन करके दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियों का उपशम करके या तो द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि हो जाय अथवा तोनों प्रकृतियों का .क्षम करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि हो जाय, तब श्रेणी चढ़ने का पात्र होता है। प्रश्न :--श्रेणी किसे कहते हैं ? उत्तर :-जहाँ चारित्र मोहनीय की शेष रही इक्कीस प्रकृतियों का क्रम से उपशम या क्षय होता है, उसे श्रेणी कहते हैं । -- -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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