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________________ अध्याय : पांचवा ] [ ४४१ क्रिया आयोग केवली के होती है, क्योंकि प्रयोग केवली के योगों की क्रिया का सर्वथा अभाव है। पृथक्वेन वितर्कस्य विचारो यत्र विद्यते । सवितर्क सविचारं सपथक्स्वं तदिष्यते ॥१०७४॥ जिस ध्यान में पृथक्-पृथक् रूप से वितर्क अर्थात् श्रुत का विचार अर्थात् संक्रमण होता है अर्थात् जिसमें अलग-अलग श्रुतज्ञान बदलता रहता है उसको सबितर्क सविचार सपृथकत्व ध्यान कहते हैं। अवीचारो चितर्कस्य चौकत्वेन संस्थितः । ... सवितर्कमवीचारं सदेकत्वं विदुर्बुधाः ।।१०७५॥ जिस ध्यान में वितर्क का विचार (संक्रमण) नहीं होता और जो एक रूप में स्थित हो उसको पंडितजन सवितर्क अविचार रूप एकत्व ध्यान कहते हैं। पृथक्रवं सत्र नानात्वं वितर्क: धतमुस्यते । अर्थ व्यजनयोगामां वीचारः संक्रमः स्मृतः ॥१०७६।। वहां नानात्व अर्थात् अनेक पने को पृथकत्व कहते हैं, शुत ज्ञान को वितर्क कहते हैं और अर्थ, व्यञ्जन और योगों के संक्रमण का नाम विचार कहा गया है। अर्थादन्तिरापत्तिरर्थ संक्रान्ति रिष्यसे । ज्ञेया व्यजनसंक्रान्तिव्यंजनाध्यञ्जने स्थितिः ॥१०७७।। स्यादियं योग संक्रांतियोगायोगान्तर गतिः। विशुद्ध ध्याम सामरिक्षीय मोहस्य योगिनः ॥१०७८॥ . एक अर्थ (पदार्थ) से दूससे अर्थ की प्राप्ति होना अर्थसंक्रान्ति है; एक व्यञ्जन से दूसरे व्यञ्जन में प्राप्त हो कर स्थिर होता व्यञ्जनसंक्रान्ति है; और एक योग से दूसरे योग गमन करना योम संक्रान्ति है। इस प्रकार विशुद्ध ध्यान के सामर्थ्य से जिसका मोहनीय कर्म नष्ट हो गया है ऐसे योगी के ये होते हैं। अर्थादर्थ वचः शब्दं योगायोग समाश्रयेत । पर्यायादपि पर्यायं द्रव्यागोश्चिन्तयेदणम् ॥१०७६।। एक अर्थ से दूसरे अर्थ का चिन्तबन करे; एक शब्द से दूसरे शब्द का और एक योग से दूसरे योग का आश्रय ले; एक पर्याय से दूसरे पर्याय का चिन्तवन करे; और द्रव्य रूप अणु से अणु का चिन्तवन करे; ऐसा अन्य ग्रन्थों में लिखा है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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