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[ गो. प्र. चिन्तामणि आलंबन होता है; और अन्त के दो शुक्लध्यान, जो कि जिनेन्द्रदेव के होते हैं, वे समस्त प्रालंबन रहित होते हैं। .
. : सवतर्क सवीचार सपृथक्त्वं च कीतितम् । शुक्ल माद्य द्वितीयं तु विपर्यस्तमतोऽपरम् ॥१०७०॥
आदि के दो शुक्ल ध्यानों में पहला शुक्ल ध्यान वितर्क, विचार और पृथक्त्व सहित है, इसलिए इसका नाम पृथक्त्व वितर्क विचार है और दूसरा इससे विपर्यस्त है, सो ही कहते हैं।
सवितर्कमविचार मेकत्व. पदलालितम् । कोतितं मुनिभिः शुल्क द्वितीयमति निर्मलम् ॥१०७१।।
दूसरा शुक्लध्यान वितर्क सहित है, परन्तु विचार रहित है, और एकत्व पद से लाञ्छित अर्थात् सहित है; इसलिये इसका नाम मुनियों ने एकत्य वितर्क विचार कहा है। यह ध्यान' अत्यन्त निर्मल है।
सूक्ष्म क्रिया प्रतीपाति तृतीयं सार्थनामकम् । . . समुच्छिन्नक्रियं ध्यानं. तुर्यमार्योनवेदितम् ॥१०७२॥
तीसरे शुक्लध्यान का सूक्ष्म क्रिया अप्रतिपाति ऐसा सार्थक नाम है; इसमें उपयोग की क्रिया नहीं है, परन्तु काय की क्रिया विद्यमान है। यह काय की क्रिया घटते-घटते जब सूक्ष्म रह जाती है, तब यह तीसरा शुक्ल ध्यान होता है, और इससे इसका सूक्ष्म क्रिया अप्रतिपाति ऐसा. नाम है; और आर्य पुरुषों ने चौथे ध्यान का नाम समुच्छिन्न क्रिया. अर्थात व्युपरत क्रिया. निवृत्ति ऐसा कहा है। इसमें काय की क्रिया भी मिट जाती है ।
तत्र त्रियोगिनामा द्वितीयं त्वेकयोगिनाम् । तृतीयं तनुयोगानां स्थातुरीयभयोगिनाम् ।।१०७३॥
शुक्ल ध्यान के चारों भेदों में पहला, जो पृथक्त्य वितर्क विचार है, सो मन, वचन, काय, इन तीन योगों वाले मुनियों के होता है; क्योंकि इसमें योग पलटते रहते हैं। दूसरा एकत्व वितर्क विचार किसी एक योग से ही होता है; क्योंकि इसमें योग पलटते नहीं; योगी जिस योग में लीन है, वही योग रहता है; तीसरा सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति काय योग वाले के ही होता है। क्योंकि केवली भगवान् के केवल काय योग की सूक्ष्म क्रिया ही है: शेष दो योगों की क्रिया नहीं है; और चौथा समुछिन्न
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