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श्रध्याय: पांचवां ]
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इन्द्रिय और मन का निरोध करना तप है । अथवा अपनी इच्छाओं का रोकना तप है। वह तप वाह्य और ग्राभ्यन्तर के भेद से दो प्रकार का है। तथा दोनों प्रकार केतु में प्रत्येक तप के बाह्य तप के भेद
होते हैं.
अनशनावसौदर्य वृत्ति संख्या रसोज्झिती ।
विविक्त शयनासनं कायक्लेशो बहिस्तप ॥७८२॥
अनशन, प्रमोद, वृत्तिपरिसंख्यान, रस परित्याग, विविक्त शयनासन और कायक्लेश से छह प्रकार के बहिरंग तप है ।
अनशन तप का स्वरूप---
प्रशनत्यामोऽनशनं साकांक्षाकांक्ष भेदगम् ।
तदाद्यमेक
द्वियादिषण्मासानशनन्तगम् ३७८३॥
चार प्रकार के थाहार का त्याग करना अनशन है । वह अनशन साकांक्षा और अनाकांक्षा के भेद से दो प्रकार का है। साकांक्षा अनशन एक मास दो महिना तीन महिना चार महिना, पांच महिना यादि श्रनेक भेद वाला है। जहां एक दो दिन आदि से लेकर छह महीना पर्यंत मर्यादित भोजन का त्याग किया जाता है वह साकांक्षा नामक अनशन है । यावज्जीव आहार का त्याग नाकांक्षा अनशन हैं। साकांक्षा अनंशन के भेद
साकार सर्वतो भद्रसिह निष्क्रीडितादयः ।
साकांक्षस्योपवासस्य भेदाश्चैकांतरोदयः ॥७५४॥
साकांक्षा उपवास के साकार, सर्वतोभद्र सिंह निष्क्रीड़ित यादि और एकांतरोदय यदि श्रनेक भेद हैं ।
नन्दीश्वर पंक्ति, चारित्र शुद्धि दुःख हरण, सुख कररण, लक्षण पंक्ति, सिंह निष्क्रीडित, भद्रावसन्त, त्रिलोक सार, श्रुत स्कंध, विभान पंक्ति, सुरज मध्य, मृदंगमध्य, शातकुम्भ, श्रुतज्ञान, द्वादशप्रत, विपंचाणतत्रत, घातिशयत्रत, रत्नत्रय पोशकारण, अष्टक, दशलक्षग्ण, पंचकल्याणक महापंचकल्याणक जिनेन्द्र महात्म्य, ध्यानपंक्ति, प्रमाद परिवार, सम्प्रत्ति संयमपक्ति प्रतिष्ठाकर, महोत्सव, संन्यास महोत्सव, जिन गुण सम्पति, आदि अनेक रूप जिनेन्द्र भगवान द्वारा कथित व्रत हैं । यह सब साकांक्षा