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[ गो. प्र. चिन्तामणि है अर्थात् जो हितोपदेश देता है ऐसा गाधर प्रायिकाओं के प्रतिक्रममादिकों का उपदेश देने में योग्य हैं।
गंभीरो दुद्धरिसों मिदवाठी अध्यकोदुहल्लो य. चिरपन्वइदो गिहिदत्यो अज्जारणं गरराघरो होदि ।७७६।।
गंभीर-जिसमें अगाधगुण हैं, दुद्धर्ष-जिसका अंत: करण स्थिर है अर्थात : निर्भय है, अल्प भाषण करने वाला, अल्प कौतुहल-जिसको थोड़ा विस्मय होता है, . अर्थात् जिसके मन में कार्यकारण मंबंधज्ञान जल्दी ध्यान में आने से जिसका आश्चर्य नष्ट होता है अथवा शिष्यादि के दोष मालम पड़ने पर भी किसी के आगे जो प्रगट नहीं करता है। चिर प्रजित-दीर्घ काल तक जिसने व्रत भार धारा किया है अर्थात् जो गुणों से ज्येष्ठ-श्रेष्ठ हैं, गृहीतार्थ-पदार्थों का स्वरूप जानने वाला और प्राचार, प्रायश्चिनादिकों के स्वरूप का ज्ञाता ऐसा जो महामुनि वह आर्यिकानों का गणधर होता है, ऐसे मुनि के पास प्राधिकायें प्रतिक्रमणादि विधि करती हैं। पीर भी आर्यिका. समाचार विधि में सब कहा गया है । और भी आचारसारादि ग्रंथो से जानना । अब आगे बारह तपादिकों का वर्णन करते हैं । तपों का स्वरूप--- ___ तपः पोलेन येनासो संसारो रूसरित्पतिः ।
तौर्यते त्वरयेदानी तत्तपः प्रतिपाद्यते ॥७८०॥
जिस तपरूपी नौका से शीत्र ही संसार रूपी विशाल समुद्र पार किया जाता . है इस समय उस तम को प्रतिपादन किया जाता है. 1 .
जिसकी सहायता से भव्य प्राणी संसार समुद्र को पार करते हैं । अर्थात् जो संसार समुद्र से तिरने के लिए नौका के समान है प्राचार्य उस तपाचार का इस समयः । . वर्गान करते हैं। .
. .... तपः प्राहुरनुष्ठानं मानसाक्षनियामकम् ।
बाह्याभ्यन्तर भेदं तत्प्रत्येक घड्विधं मतम् ।।७८१।।
मन और इन्द्रियों का निरोध करने वाले अनुष्ठान को लप कहा है, वह तप - बाह्य और अभ्यन्तर के भेद मे दो प्रकार का है । और उनमें प्रत्येक छह प्रकार का - माना गया है। ..