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अध्याय : पांचवा ]
[ ३५१ करते हैं तथा जो प्राचार्य कहते हैं वह सत्य-प्रभाग युक्त है, अन्यथा नहीं है ऐसा जानकर लोगों के द्वारा प्रदगा किया जाता है ! इस प्रकार मानार्य का स्वरूप हैं ।
मंभीरो बुद्धरिसो सूरोधम्मप्पहवारसा सीलो । खिदिससिसायर सरिसो कमेण तं सो.दु संपत्तो ॥७७७॥
१. गंभीर-जिनको क्षोभ उत्पन्न नहीं होता है। अथवा जिनके गुणों का पार नहीं लगता है । २. दुर्द्धर्ष -प्रवादी जिनका पराभव नहीं कर सकते हैं। प्रावादी जिनके सम्मुख पा नहीं सकते । जिनसे वाद करने में असमर्थ होते हैं। ३. शूर-कार्य करने में समर्थ, धर्म भावनाशील-धर्म व प्रभावना करना यह जिनका स्वभाव है । अर्थात् दान,तप, जिन पूजा,विद्या इनके अतिशय से प्रभावना करने वाले होते हैं।
क्षिति शशिसागर सदृश-क्षमा गुण होने से पृथ्वि के समान सौम्यता से चंद्र ___ समान और निर्मलता से समुद्र तुल्य ऐसे गुणों से संपन्न आचार्य होते हैं ।
और भी बारह प्रकार के तयों का प्राचरण करते हैं। दश धर्मों का पालन करते हैं और छह आवश्यक, सीन गुप्तियों का पालन करते हैं। पंजाचार का पालन करते हैं ऐसे प्राचार्य होते हैं। प्रायिकाओं के आचार्य---
पियधम्मो विदधम्मो, संबिग्गी बज्जभरू परिसुद्धो। . संगहणुग्गकुसलो सददं सारक्खरएजुत्तो ॥७७८।।
प्रायिकाओं का गरराघर (प्राचार्य) इन गुणों का धारण करने वाला होता है । प्रियश्रर्मा-उत्तमक्षमादिक धर्म अथवा चारित्र जिसको प्रिय है, अर्थात् उपशमादि धर्मों से जो युक्त है।
दृढधर्मा-जो धर्म में दृढ विचार रखने वाला हो, संविग्न-धर्म और धर्म फल में अतिशय उत्साहयुक्त अर्थात हर्षयुक्त है, अवश्य भीरू-पापों से डरने वाला, परिशुद्धपरि सर्व-पूर्ण धने से शुद्ध अर्थात् जिसका चारित्र अखंडित है ऐसा, संग्रहानुग्रहकुशलसंग्रह-दीक्षा-उपदेश इत्यादिकों से शिष्यों के ऊपर उपकार करने वाला तथा शिष्यों का संग्रह करने वाला । योग्य ऐसे व्यक्ति को दीक्षा देकर शिष्य बनाना व उनको शास्त्रोपदेश देकर विद्धान तथा सदाचार युक्त करने वाला हो। तथा सतत सारक्षण..पाप क्रियाओं से जो निवृत्ति उसको सारक्षमा कहते हैं ऐसी निवृत्ति से युक्त जो होता.