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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्राचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान, गगा, कुल, संघ, साधु और मनोज ये दश प्रकार के मुनि होते हैं। प्राचार्य का स्वरूप--
सदापायार विछण्हू सदा प्रायरियं चरे। आयारमायार बंतो प्रायरि पो तेण वुच्चदै ॥७७४॥
जो साधु हमेशा-सर्व काल याचार को जानते हैं, उनको प्राचारवित् कहते हैं। रात में और दिन में प्राचार का परमार्थ रहस्य जानकर जो वैसा आचरणा करते हैं, उनको प्राचार्य कहते हैं। जो यन से युक्त होकर सदाचार-शोभन', प्राचारनिर्दोष दर्शनाचार, ज्ञानाचारादि पांच प्राचारों का पालन करते हैं । जो गराधारादिकों को मान्य ऐसे प्राचार का पालन करते हैं। तथा मुनिपता के लिये योग्य दीक्षा काल तथा शिक्षा काल के आचरण करके कृत कृत्य हुए हैं उनको आचार्य कहते हैं। अन्य साधुनों को जो पंचाचार में तत्पर हैं। उन को प्राचार्य कहते हैं ।
जम्हापंचविहाचारं आचरंतोषभासदि। पायरि दाणि देसन्लोमाइरियो तेरा उच्च १७७५॥
जो दर्शनाचारादि पाँच प्रकार के प्राचारों का पालन करता हुआ शोभता है। तथा जो अपने निर्दोष पांच प्राचार लोगों को शिष्यों को दिखाता हुवा शोभता है वह प्राचार्य है।
संग्रहणुगह कुसलो सुन्नत्थ बिसार यो पहिय कित्ती । किर पाचरणसुजुतो गाय प्रादेज्जवयो य ॥७७६॥
संग्रह-दीक्षा देकर अपने संघ में दाखिल करना; अनुग्रह-जिसको दीक्षा दी उस शिष्य को शास्त्रादिकों का शिक्षण देना ऐसे दो कर्तव्यों में प्राचार्य कुशल होते हैं। सूत्रार्थ विशारदत्व यह गुण प्राचार्य में ऊपर के गुणों के साथ रहता है । मूत्र और उसका अर्थ वार्तिक तथा भाष्य का ज्ञान उन में रहने से उसका विस्तृत खुलासा बे जानते हैं तथा भव्यों को कहते हैं उनकी निर्मल कीति सर्व दिशा में फैलती है । वे क्रियाचरण मयुक्त रहते हैं अर्थात् पंच नमस्कार छह अावश्यक क्रिया (सामायिकादिक) आसिवा और निधिका ऐसी तेरह क्रियानों में वे तत्पर रहते हैं। तथा पांच महाव्रत समितियों और तीन गुप्ति ऐसे तेरह पाचरणों में वे हमेशा तत्पर रहते हैं। वे प्राचार्य ग्राह्य व प्रादेय वचन गुरण के धारक होते हैं । अर्थात् जिनके वचन सुनने से ही सर्व लोक ग्रहण