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________________ अध्याय : पांचवां ] [ ३४६ मुहर्त में भोजन करना उत्कृष्टाचरण है। सिद्ध भक्ति के नंतर का यह भोजन काल का प्रमागा कहा है । भोजन के लिए भ्रमण करने वाले परन्तु भोजनको प्राप्त नहीं हा है ऐसे मुनि का यह काल प्रमाण नहीं है। एक्कम्हि दोणि तिषिण य मुत्तकालो दु उत्तमादोगो। . पुरदो य पच्छिमेण्ड य पालीतिगवज्जिदो चारे ॥७७१।। सूर्योदय के तीन घटिका के अन्तर और सूर्यास्त की तीन घटिका के पूर्व वीच के काल में ग्राहार का काल है । तीन मुहूर्त का भोजन काल जघन्य काल माना गया है। दो मुहूर्त का काल और एक महूर्त का काल उत्तम माना है। भिक्षा के लिये गमन की प्रवृत्ति भिक्खा चरियाए पुरष गुत्ती गुण सोल संजमादीणं । रक्खंतो चरदि मुणी पिव्वेदतिगं च पेचछतो ॥७७२।। भिक्षा के लिये ग्राम में प्रवेश करने वाला साधु मनोगुप्ति, वचन गुप्ति और काय गुप्ति का रक्षा करता हुआ प्रवेश करता है अर्थात् गुप्ति पूर्वक प्रवेश करता है। अपने मूल गुरणों का रक्षण करता. दुसा प्रवेश कारन है। नया शील और संयमों का रक्षा करता है । वह साधु शरीर वैराग्य, संगवैराग्य और संसार चैराग्य का रक्षण करता हुया प्रवेश करता है। प्रारणा अगवत्या वि य मिच्छत्ताराहणादरगासो य । संजमविराधरणा वि य चरियाए परिहरेदव्या ॥७७३।। वीतराग प्रभू के शासन का रक्षण करता हुआ साधु पाहार के लिये ग्रामा. दिक में प्रवेश करता है । साहार को जाता हुअा वह साधु स्वेच्छावृत्ति का त्याग करता है सम्यक्त्व के प्रतिकुल प्राचरा. का त्याग करता है। प्रात्मधात अपने सम्बग्दर्शन, ज्ञान चारित्र घात को प्रात्म नाश कहते हैं अर्थात् रत्नत्रय का नाश नहीं होने देता है और संयम का रक्षण करता है । (मूलाचार, प्रा. कुन्द-कुन्द कृत) इस प्रकार साधुनों के मूल गुणा व चर्या आहार शुद्धि प्रादि का वर्णन किया अव षष्ठम गुणस्थान के अन्तर्गत साधुनों के भेदों का वर्णन करते हैं । प्रश्न :--दश प्रकार के साधु होते हैं वो कौन से हैं ? . उत्तर :--प्राचार्योपाध्याय तपस्वि शक्षग्लान गण कुल संध साधु मनोज्ञानाम् । .. ..
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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