SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 437
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ वेदक ] एषला समिति का पालन- दव्वं खत्तं कालं भावं बलवीरियं च खाकखं । [ गो. प्र. चिन्तामणि कुज्जा एसरणसमिदि जहोवदिट्टु जिपमदम्मि ||७६८६ | | द्रव्य - आहारादिक वस्तु, क्षेत्र - जांगल, अनूप और साधारण ऐसे क्षेत्र के तीन भेद हैं । काल- शीतकाल, उष्णकल, वर्षाकाल ऐसे काल के तीन प्रकार हैं । भावरमा के परिणामों को भाव कहते हैं । अर्थात् श्रद्धा की कहता चाहिये 1 जांगल क्षेत्र - जिस देश में पानी, वृक्ष और पर्वत, ग्ररूप रहते हैं उसको जांगल कहते हैं । अनूप क्षेत्र - पानी, वृक्ष और पर्यंत, जहाँ बहुत होते हैं यह अनूपक्षेत्र साधारण क्षेत्र --- जिस देश में पानी, वृक्ष और पर्वत अधिक और अल्प भी नहीं रहते हैं सम रहते हैं उसको साधारण क्षेत्र कहते हैं । वल अपने शरीर सामर्थ्य को बल कहना चाहिए। ग्रात्मा के सामर्थ्य को वीर्य कहते हैं द्रव्य, क्षेत्र, काल. भाव और बल और वीर्य को जानकर श्रागम में कही हुई एषणा समिति का पालन करना चाहिये । द्रव्य क्षेत्रादि के अनुसार प्रवृत्ति न करने से वात पित्तश्लेष्मादि की उत्पत्ति होती है । साधु के भोजन की पद्धति- श्रद्धसरपरस सध्विजणस्स उदरस्स तदियमुदए । वा उसंचरण arcane भिक्खु ॥७६६॥ पेट का आधा भाग व्यंजन सहित अन्न के द्वारा भर कर उदक में पेट का तीसरा भाग भरना चाहिये और वायु के संचारार्थ चौथा भाग रिक्त रखना चाहिये । ऐसे कार्य से पडावश्यक क्रिया सुख से साधु कर सकेंगे । ध्यानाध्ययनादिकों में प्रवृत्ति होगी और जीर्णादिक भी उत्पन्न नहीं होगें ! भोजन योग्य काल का वर्णन सूरूदयत्यमरणादो खालीतिय वज्जिदे असणकाले । लिग दुगगमुहत्ते जमज्झिम्ममुक्कस्से ||७७०॥ सूर्योदय से तीन घटिकात्रों को छोड़कर अर्थात् सूर्योदय के अनंतर तीन घंटिका काल बीत जाने पर और सूर्यास्त को तीन घटिका काल अवशिष्ट रहने पर बीच का काल आहार का काल माना जाता है, उस ग्राहार काल के तीन मूहूर्ती में भोजन करना जघन्याचरण है। दो मूहर्ती में भोजन करना मध्यमाचरण है और एक
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy