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अध्याय : पांचवां ]
[ ३८७ समझेगा तब वह कर्मबंध से युक्त होता है । मेरे लिये बना है ऐसा समझकर उसमें वह साधु पादर युक्त होता है, जिससे उसको कर्म बंध होता है । कृतादि दोष रहित आहार लेने का अभिप्राय धारण करने वाले साधु को यदि अधः कर्म युक्त आहार प्राप्त हो गया और उनसे वह ग्रहण किया तो भी साधु ने शुद्ध आहार की बुद्धि से उसे ग्रहण किया था अतः उसको वह अाहार कर्म बंध का कारण नहीं होता है ।
सवो वि पिंडदोसो दव्वे भावे समासदो दधिहो। दवनगयो पुरण दवे भाव गदो अप्प परिणामो ॥७६६॥
मोट हो ध्या सोप और भाव पिंड दोष ऐसे दो भेद हैं। प्राहार के छियालीस दोष हैं उतने ही द्रव्य पिड दोप व भाष ग्रिड दोष छियालीस छियालीस होते हैं । आहारादिक पदार्थ उद्गमादि दाप सहित होने पर भी अधः कर्म से युक्त होने पर उनको द्रव्य गत पिंड दोष कहते हैं । प्रात्म परिगाम को भाव कहते हैं । द्रव्य शुद्ध होने पर भी परिणामों की अशुद्धि से उसको अशुद्ध कहते हैं । अतः भाव शुद्ध का रक्षण प्रयत्न पूर्वक करना चाहिये । भाव शुद्धि से ही तपश्चरण और ज्ञान दर्शनादिक व्यवस्थित, निर्मल और प्रात्मोन्नति के हेतु होते हैं । द्रध्य के भेदों का वर्णन--
सब्वेसणं च विषरणं च सद्ध सणं च ते कमसो । एसरण समिवि विसुद्ध रिपब्वियडमवंजणं जाणे ।।७६७॥
सर्वेपण, असर्वेयरण, विद्वेषगा, अविद्वेषण, शुद्धाशन, अशुद्धाशन ऐसे ग्राहार के भेद हैं । सर्वेषण-एषणा समिति से युक्त आहार को सर्वेपण पाहार कहते हैं । पांच रसों से रहित अर्थात् गुड, तेल, घी, दही, दुध शाकादि रहित अाहार को निविकृताहार कहते हैं । भात की पेज जिसको कांजी कहते हैं उसको सौवीर ऐसा भी नाम है । अर्थात् कांजी नवनीत रहित छाछ प्रादि से रहित आहार को अव्यंजन कहते हैं। एकाने पर जिस अन्न के ऊपर नमक, मिरच वगैरह का संस्कार नहीं करते हैं ऐसे पाहार को शुद्धाशन कहते हैं । ऐसे कम से आहार के भेद जानने चाहिये। ये तीन प्रकार के आहार द्रव्य योग्य हैं । सर्व रस युक्त और सर्व व्यंजन युक्त ऐसा असर्वाशन कदाचित् योग्य भी है और अयोग्य भी है । इस प्रकार से वर्गान करने पर एषगणा समिति का वर्णन होता है।