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[ गो. प्र. चिन्तामणि दोष रहित माहार साधु ग्रहण करते हैं----
पगदा असहो जम्हा तम्हादो दव्वदोत्ति तं दध्वं । फासुगमिदि सिद्ध वि य अप्पट्टकदं असुद्ध'तु ।।७६३।।
साधु द्रव्य और भाव से प्रासुक आहार ग्रहण करते हैं । द्रव्य प्रासुकता का स्पष्टीकरण-जिस द्रव्य से प्राणी निकल गये हैं अर्थात् जो द्रव्य-पाहारादिक पदार्थ एकेन्द्रियादि प्राणियों से रहित है उसको द्रव्यप्रासुक कहना चाहिये । अर्थात् जीव रहित तथा द्वीन्द्रियादिकों के शरीर जिसमें नहीं पाये जाते हैं ऐसा आहार द्रव्यप्रामुक आहार है । जिसमें द्वीन्द्रियादिक और उनके शारीर हैं वह ग्राहार दूर से ही त्यागना चाहिये । क्योंकि वह द्रव्य से अशुद्ध है। द्रव्य से आहार प्रामुक होने पर भी यदि वह अपने लिये बनाया है ऐसा मुनि विचार करते हैं तो बह पाहार द्रव्य से प्रामुक और भाव से अप्रासुक समझना चाहिये । यद्यपि वह द्रव्यतः शुद्ध है तो भी अशुद्ध ही : समझना चाहिये। पर के लिए बनाया श्राहार शुद्ध
जह मच्छयाण पगदे मदणुदए हि मज्जति । गहि मंडूगा एवं परमकदे जदि विसुद्धो ॥७६४॥
जैसे मत्स्यों के लिये बनाये हुए मादक जल से मत्स्य ही विह्वल होते हैं परन्तु मेंढ़क विह्वल नहीं होते हैं। जिस जल में मत्स्य रहते हैं उसी में मेंढ़क भी रहते हैं परन्तु वे मेंढक उस पानी से विह्वल नहीं होते हैं। क्योंकि उनको उन्मत्त । करने की शक्ति उस पानी में नहीं है । इसी प्रकार से पर के लिये बनाये हुए याहार में प्रवृत हुए मुनि उस दोष से लिप्त नहीं है। जो आहार बनाने वाले गृहस्थ है वे उस दोष से लिप्त होते हैं । जो सम्यग्दृष्टि गृहस्थ साधुओं को आहार देते हैं, वे अत्रः कर्मादि दोषों को दूर कर साधुदान फल से स्वर्ग और मोक्ष को जाते हैं। परन्तु जो . मिथ्यादृष्टि हैं ऐसे गृहस्थ साधु दान से भोग भूमि में जन्म धारण करते हैं। भाव से शुद्ध पाहार का निरूपण--- ___ ग्राधाकम्मपरिणदो फासुगदव्वे वि बंधश्रो भणिदो।
सुद्धं गयेसमापो प्राधाकम्मे वि सो सुद्धो ॥७६५॥ पाहार के पदार्थ शुद्ध होने पर साधु यदि पाहार मेरे लिये बनाया है एमा
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Poetic