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अध्याय : पांचवां ]
[ ३४५ अंगार दोष रहित तथा धूम दोष रहित आहार मुनि लेते हैं। तथा वेदना परिहार, वैयावृत्य, अावश्य क्रिया, संयम इत्यादि पटकारण युक्त आहार वे लेते हैं । क्रम युक्त, प्राण धारण युक्त अथवा मोक्ष मार्ग को साधन भूत और चौदह मलों से रहित आहार साधू लेते हैं । चौवह सलों का वर्णन---
गहरोमजंतु अट्ठी करण कुडयपूय चम्मयरूहिरं च ।
बीय फल - सासं च मला दु चोइसमे ॥७६२ ।। - नख---मनुष्य अथवा तिर्यंच के हाथ के अलावा चरण के अगुलियों के अन.. भाग अर्थात् नख । केश- मनुष्य के अथवा पशु के बाल ! जन्तु-प्रारण रहित शरीर । अस्थि-ककाल । हड्डी, करण--जब, गेहूं आदि धान्यों का बाह्य अवयव--- छिलका । कुड शाल्यादिकों का अभ्यन्तर सूक्ष्म अवयव । पूय-पक्क रक्त अर्थात् बाग से निकलने वाला सफेद पीब। चर्म शरीर की त्वक चमड़ा । चमडा प्रथम धातु है । रक्त द्वितीय धातु है। मांस रक्त की प्राधार भूत तीसरी धातु है । बीज----- जिससे अंकुरोत्पत्ति होती है, ऐसे गेहूँ, जब अादि । फल- जामुन, ग्राम आदि फल । कंद-.-अंकुर के उत्पत्ति का भूमिगत गड्ढा प्रादि जिस को सूरण, रक्तालुक, गर्जर आदि कहते हैं, ऐसे ये चौदह मल हैं। इनमें से कोई महा मल है। कोई अल्प मल है। कोई महा दोष है। कोई छोटे दोष हैं। रुधिर, मांस, अस्थि, चर्म और पीव ये महादोष हैं । आहार में ये दिखने पर अाहार छोड़कर प्रायश्चित भी लेना चाहिए । हीन्द्रिय, वीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जीवों का शरीर आहार में देखने पर प्रहार का त्याग करना चाहिये । केश आहार में देखने से आहार छोड़ना चाहिये । नख दीखने पर आहार का त्याग कर अल्प प्रायश्चित · भी लेना चाहिये । करा, कुड, वीज, कद, फल आहार में देखने पर इनको आहार से अलग करके आहार ले सकते . . हैं, यदि अलग करना अशवय हो तो याहार का त्याग' करना चाहिये ।
सिद्ध भक्ति के अनन्त र शरीर में से यदि रक्त और पीब बहेगा, तो पाहार का त्याग करना चाहिये। जो अन्न परोसता है उसके शरीर में से रक्त और पीव निकलता हो तो ग्राहार का उस दिन त्याग करना चाहिये। मांस भी शरीर में से निकलता हो तो उस दिन में ग्राहार का त्याग करना चाहिये । पाठ प्रकार की पिंड शुद्धि में चतुर्दश मलों का प्रकरण नहीं कहा था, अतः इसका यहां वर्णन किया है । . . . . .