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[ गो. प्र. चिन्तामणि करते हैं । मेरा शरीर पुष्ट होकर उसमें मांस वृद्धि होवे इस हेतु से भी वे भोजन नहीं करते हैं । अथवा शरीर में कांतिवृद्धि होने के लिए भी वे ग्राहार नहीं करते हैं । यदि उपर्युक हेतुओं से भोजन नहीं करते हैं, तो श्राहार किस हेतु से लेते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर--स्वाध्याय करने के लिए, संयम के लिए और ध्यान के लिए, बे ग्राहार ग्रहण करते हैं । ग्राहार के बिना स्वाध्याय, ध्यान और संयम में मन नहीं लगता है, अंतः मुनि संयम ध्यानसिद्धयर्थं और स्वाध्याय सिद्धयर्थ ही ग्राहार लेते हैं ।
मुनि कौन सा आहार ग्रहण करते हैं-
एव कोढी परिशुद्ध असणं बादाल दोस परिहीणं । संयोजणाए हीणं पमास सहियं विहितुदितं ॥७६०॥
चाहार यदि नवकोटिनों से शुद्ध होगा तो मुनि वह ग्रहण करते हैं, अन्यथा नहीं । अर्थात् मन से किया गया, करवाया गया और अनुमोदन दिया गया आहार मुनि नहीं लेते हैं। क्योंकि दाता ने यदि मुनि के लिए प्रहार मन से किया, करवाया और अनुमोदन दिया होगा, तो वह ग्रहार मुनियों के लिए योग्य है। मन की तीन कोटियां वचन को तीन कोटियां और शरीर की तीन कोटियां ऐसी नवकोटियां से आहार यदि रहित हो तो मुनि उसे ग्रहण करते हैं । उद्गम, उत्पादन और एपसा दोष से रहित प्रर्थात् ४२ दोष रहित, संयोजन दोष रहित, प्रभाग सहित ग्राहार त्रे लेते हैं । तथा मुनियों का ग्रादर से स्वीकार करना, उच्चासन पर बैठाना, उनके चरा धोना और उनकी पूजा करना, मन, वचन और शरीर शुद्ध करना और ग्राहार की शुद्धि करना ऐसे विधियों से दिया हुआ ग्राहार मुनि लेते हैं, अन्यथा नहीं । दाता सात गुणों से सहित होना चाहिये। उसके गुणों का वर्णन जो दाता मुनियों को आहार देता है, वह श्रद्धा दान देने से मिलने वाले भोग भूभि मुखादि में विश्वास रखना । भक्ति-पात्र के गुणों पर अनुराग । तुष्टि दान देने में हर्ष रखना | विज्ञानप्रहार देने का परिज्ञान होना । अलुब्धता - सांसारिक फलों की अपेक्षा न रखना । क्षमा-कोप के कारण उत्पन्न होने पर भी शान्ति रखना भी धनाढ्यको प्राचर्य चकित करने वाला दान देना, ऐसे इनसे युक्त दाता जो दान देता है, वह मुनि ग्रहग करते हैं । •fafगाल विधूमं छक्कारण संजुदं कम विसुङ्ख ं । जत्तासाधरणमेत्तं चोदसमलवज्जिदं भजे ॥७६१ ॥ ॥
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शक्ति - खुत्पत्ति होने पर दाता के सात गुणा है,