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अध्याय : पांचवां ] पाहार त्याग के कारणों का वर्णन
आदके उवसग्ये तितिक्खरणे बंभचेर गुत्तीयो। पारिण दयातव हेउ सरीर परिहारं वोच्छेदो ।।७५८॥
आकस्मिक व्याधि होकर मारणान्तिक पीडा जब होती है, तव मुनि ग्राहार का त्याग करते हैं । दीक्षा का नाश करने वाला उपसर्ग प्राप्त होने पर अर्थात् देव मनुष्य, तिथंच और अचेतनों का उपसर्ग होने पर मुनि श्राहार त्याग करते हैं । ब्रह्मचर्य व्रत का निर्मल रक्षा करने के लिए ग्राहार त्याग करते हैं। प्रारिणदया के लिए आहार त्याग वे करते हैं । यदि याहार मैं ग्रहण करूगा तो बहुत प्राणियों का घात होता है, अतः जीव दया के लिए मैं आहार छोड़ता हूँ, ऐसा संकल्प करके वे अाहार का त्याग करते हैं। बारा प्रकार के तपों में अनशन नामक तपश्चरण मैं अाज करता हूँ, ऐसा संकल्प करके वे पाहार त्याग करते हैं। संन्यास काल प्राप्त होने पर वे ऐसा विचार करते हैं-यह वृद्धावस्था मेरे मुनि धर्म का नाश करने वाली है, मैं असाध्य रोग से पीड़ित हुआ हूँ, मेरी सर्व इंद्रियशक्ति विकल हो गई है । इस वृद्धावस्था में स्वाध्याय करने के लिए समर्थ नहीं हूं। अब · मेरे जीने के उपाय नष्ट हुए हैं । ऐसे समय में शरीर परित्याग करना योग्य ही है, ऐसे विचार से वे ग्राहार छोड़ते हैं । ऐसे छहों कारणों से वे पाहार का त्याग करते हैं। पूर्व गाथा में कहे हुए कारणों से भी यदि उनके साथ मारणान्तिक पीड़ा भी उपस्थित हुई तो पाहार का त्याग करना चाहिये, याहार ग्रहण करना योग्य नहीं है । याहार ग्रहण करने से प्रचुर जीववध होगा तो आहारादिका त्याग करना चाहिये । जिसके शरीर में पीड़ा है, वह तपश्चरण करे । इस प्रकार याहार का त्याग और स्वीकार में विषयभेद है। बलादिकों का लाभ होने के लिए मुनि कभी भी पाहार ग्रहण नहीं करते हैं, इसका स्पष्टीकरण
रग बलाउसाउअठ्ठ स सरीरस्सुवयद्वलेजट्ट । गारगट्टसंजम म ज्झारणछे चेच भुजेज्जो. ॥७५६||
युद्धादिक कार्य करने योग्य बल मुझे प्राप्त होवे ऐसी इच्छा धारण कर मुनि याहार नहीं लेते हैं। तथा आयुर्वृद्धि की इच्छा .. से भी वे आहार ग्रहण नहीं करते हैं । इस ग्राहार का स्वाद बढ़िया है, ऐसी . इच्छा से भी वे आहार ग्रहण नहीं