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श्राहार ग्रहण करने के और त्यागने के कारणों का वर्णन - स श्राहारतों बि श्रायदि धम्मं ।
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
छह फारहि छह वेव कारणेहि दु रिगज्जुहवंतो विप्रारदि ||७५६।।
भोज्य, खाद्य, लेह्य और पेय ऐसे चार प्रकार के श्राहारों का छह कारणों से प्रयोजनों से भक्षण करने वाला यति चारित्र का पालन करता है । अर्थात् श्राहार ग्रहण करता हुआ भी मुनि वैयावृत्यादि प्रयोजन के लिए आहार ग्रहण करता है । ग्रतः वह आहार करके भी धर्म सा ही करता है। तथा छह कारणों के वश होकर यदि ग्राहार परित्याग मुनि करता है तो भी वह धर्मोपार्जन करता है । यदि ing निष्कारण प्रहार करेगा तो वह आहार ग्रह दोष है । यदि सकारण मुनि प्रहार का ग्रहण अथवा वर्णन करेगा तो उसका त्याग और ग्रहण धर्माचरणरूप ही है ।
आहार ग्रहण करने के कारणों का विवेचन
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dardarava foरिया ठाणे य संजय मट्टाए ।
तथ पारणधम्म चिंता कुज्जा एवेहि श्राहारं ।।७५७।।
वेदना - क्षुधा की वेदना मिटाने के लिये मुनि भोजन करते हैं । वैयावृत्य पता और अन्यों का वैयावृत्य करने के लिए भोजन करते हैं । क्रियार्थ --- मैं भोजन नहीं करूंगा, तो सामायिकादि छह ग्रावश्यक क्रियाओं का पालन मेरे द्वारा नहीं होगा अतः उनके पालन के लिए भोजन करना मेरा कर्तव्य है, ऐसा समझकर मुनि प्रहार करते हैं । संयमार्थ -- तेरह प्रकार से संयमों का पालन करने के लिए मुनि आहार ग्रहण करते हैं | प्रभवा माहार के बिना मेरी इंद्रियां विकल होकर मैं जीव दया पालने में असमर्थ होऊंगा, ऐसा विचार कर प्राणि संयम और इंद्रिय संयम के लिए मुनि आहार ग्रहण करते हैं । तथा प्रासु चिन्ता के लिए भोजन करते हैं । मेरे दश प्राणों का रक्षण आहार के बिना नहीं होगा । श्राहार के प्रभाव में ग्रायु का रक्षण नहीं होगा, श्रतः प्राणार्थ वे श्राहार करते । तथा धर्म चिन्ता के लिए वे बाहार लेते हैं। मैं यदि आहार ग्रहण नहीं कल्या तो उत्तमक्षमादिक दश धर्म मेरे वश नहीं रहेंगे 1 बहार के विना यह जीव उत्तमलमा मार्दवादिक गुणों को धारण नहीं 'करेगा, ऋतः भोजन करना आवश्यक है, ऐसा विचार कर मुनि भोजन करते हैं । मुनि इन छह प्रयोजनों की सिद्धि के लिए आहार लेते हैं ।