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अध्याय : पांचयो । ___ छोड़ देना भी छोटित दोप है । ऐसे शंकितादिक दश दोषों का वर्णन किया है। जीव दया के लिए लोक जुगुप्सा न होवे इसलिए और पाप से अलिप्त रहने के लिए इन दोषों का त्याग करना चाहिए। संयोजना दोध और अनमारण दोष का निरूपण
संयोजणा य दोसो जो संजोएदिभत्तपारणं तु ।। अदिमत्तो श्राहारो पसाप दोसो हदि एसो।।७५४॥
संयोजना दोषाहार के पदार्थ और पान के पदार्थ अन्योन्य मिलाना मिश्रण करना। ठंडा पाहार उपपान से मिश्रित करना । संयोजना नामक दोष हैं।
अतिमात्र दोष--प्रमागा का अतिक्रमण करके भोजन करना अप्रमाण नामक दोष है । पेट के दो भाग भात, दाल, रोटी आदि से भरने चाहिए । और एक भाग द्रव पदार्थों स-जल, छाछ, दुध आदि पतले पाथों से भरना चाहिये । तथा चतुर्थभाग खाली रखना चाहिए । तभी आलस्य के बिना स्वाध्याय और आवश्यकादिक कर्तव्यों में तत्परता आती है अन्यथा नहीं । प्रमागादिक भोजन से अजीर्ण और ज्वरादिक रोग उत्पन्न होते हैं तथा निद्रा, पालस्यादिक दोप उत्पन्न
होते हैं। . अंगार दोष तथा धूम दोष का वर्णन
तं होदि सयंगालो जं आहारेदि मुच्छिदो संतो।
तं पुरण होदि सधर्म अं आहारेदि रिपदतो ॥७५५।। . अंगार दोष---जब साधु लम्पटता से आहार भक्षरण करता है, तब अंगार दोष उत्पन्न होता है। यह प्राहार बहुत मीठा है। यही आहार बार बार मेरे को मिलेगा तो अच्छा होगा, इस प्रकार की लंपटता जब पाहार में उत्पन्न होती है, तब ग्रंगार दोष उत्पन्न होता है।
सधूम दोष-मन में निंदा करता हुआ जय मुनि आहार करता है, तब धूम नामक दोष उत्पन्न होता है। ये आहार के पदार्थ मेरे मन को इप्ट नहीं है, ऐसी निदा करता हुआ पाहार करना धूम नामक दोष है । पहले दोष में लटता और दूसरे में संक्लेश परिणाम उत्पन्न होते हैं।