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[ गो. प्र. चिन्तामरि
जो उष्ण था अनंतर जो शीत हुआ ऐसा जल, चरक धोया हुआ जल, तुष धोया हुआ जल, अविध्वस्त - जिसने अपने वर्ग, गंध, रसों का त्याग नहीं किया है, ऐसा जल, और अन्य भी जल-हरित की यदि चूर्ण से जिसक वर्ग, रस, गंव में परिशति नहीं हुई है ऐसा जल इन सब प्रकार के जलों को 'अपरिगत' कहते हैं। इस प्रकार के जलों को वे अप्रासुक होने से मुनि ग्रहण नहीं करें | और जब ये परिणत होते हैं, तब ग्राह्य होते हैं अर्थात् तिलादि जलों ने अपने पूर्व के वर्ण गंधादिक छोड़कर यदि तिलादिकों के व, गंध, रसादिक धारण किये हुए हो तो ऐसे तिलजलादिकों का पान करना परिणत दोष दूषित नहीं होगा ।
लिप्त दोष का वर्णन -
रुय हरि दालेख व सेडीय मरोसिला मपिट्ठेण । सपबालोदरण लेवेण व देयं कर भाषणे लिंत्तं ।।७५२||
ठ, हरिताल, खटिका - सफेद मिट्टी, मनशील और कच्चा घाटा इनसे जो गीला हो गया है, अर्थात् गेरु, हरिताल आदिकों के द्रथ से जो लिप्त हुआ है, ऐसे हाथ से ग्रथवा पात्र से आहार देना लिप्त दोष से दूषित होता है । अपक्क जल ग्रर्थात् अप्रासुक जल, प्रपक्क शांक से जो गीला हुआ है, ऐसे हाथ से और पात्र से जो ग्रन्नादिक यदि दिये जायेंगे तो लिप्त नामक दोष होता है ।
छोटित दोष का वन
बहु परिमाणमुज्भि ग्राहारों परिगलंत दिज्जंतं ।
छंडिय भुजगमहवा छोडिद दोसो हवे शोश्रो ।।७५३॥
बहुतसा अन्न छोड़कर थोड़ा अन्न खाना यह छोटित दोष है । अथवा परोसने वाले दाता के हस्त से सत्पात्र के हस्त पर अर्पण किया जाने वाला और नीचे गिरने वाले ऐसे छाछ, दूध यादि पदार्थ का आहार लेना यह छोटित दोष है | छाछ वगैरह द्रव पदार्थ अपने हाथ से नीचे नही गिर पड़ेंगे, ऐसी पद्धति से भक्षण करना चाहिये । अर्थात् दोनों हाथों की दृढ़ अंजलि करके द्रव पदार्थ भक्षण करना चाहिये । अन्यथा द्रव पदार्थ नीचे गिरने से चींटी वगैरह प्राणियों को बाधा होंगी 1 अथवा हस्तपुट छोड़कर भोजन करना यह भी छोटित दोष है । हस्तपुट का बंधन छोड़कर अपने दोनों हाथों की अंजलि तोड़कर भोजन करना यह भी छोटित दोष है । यथवा ग्राहारों में दिये हुए पदार्थों में से इष्ट पदार्थों को खाना और अनिष्ट पदार्थ