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अध्याय : पांचवां ] और पुरुष यदि दान देंगे तो मुनियों को आहार लेना योग्य नहीं है।
पूयणपज्जालणं वा सारणपच्छादनं च विझवणं । किच्चा तहगिकज्जं णिवादं प्रणं चावि ।।७४८।।
फुत्करण-अग्नि को उत्पन्न करना, प्रज्वलन-मुख' की हवा से अभन्दा अन्य प्रकार से अग्नि और लकडियों को प्रदीप्त करना । सारण-अग्नि में लकड़ियाँ डाल देना, प्रच्छादन--अग्नि को भस्म से हकना, विध्यापन-जलादिक से अग्नि को बुझाना, अग्निकार्य-अग्नि को इतस्ततः फैलाना, निति-अग्नि में से लकडियों का निकालना । घट्टन-अग्नि को दयाना इत्यादि कार्य करने वाली स्त्री या पुरुष मुनियों को दान देने के लिये योग्य हैं।
लेदरसमज्जराकम्मं पियमा दारयं च रिगवखविय । ...
एवं विहादिया पुरण दाणं जदि दिति दायगा दोसा ॥७४६॥
लेपन--गोवर और मिट्टी प्रान्दिक से भीत, जमीन आदिकों को लेपना, मार्जनस्नानादिका करना, ऐसे कार्य करने वाली स्त्री पुरुष आहारदान देने में अयोग्य हैं। स्तनपान करते हुए बालक को छोड़कर कोई स्त्री प्राहारदान देने में उद्यक्त हई तो उससे ग्राहार लेना योग्य नहीं है। इसी प्रकार अन्य भी कार्य करने वाले दान देने योग्य नहीं है। उन्मिन दोष का वर्णन---
पुढवी प्राऊ च तहा हरिदा बीया तसा च सज्जीवा । पंचेहि तेहि मिस्सं पाहारं होदि उम्मिस्सं ॥७५०॥
पृथिवी-..-मिट्टी, प्रापू-अप्रासुक जल, हरित्-वनस्पतिकाय पत्र, पुष्प, फल आदिक । बीज जव, गेहूँ आदिक और त्रस-जीते हुए द्वीन्द्रियादि जीव इन पांचों से मिश्र जो पाहार उसको उन्मिथ आहार कहते हैं, ऐसा आहार लेना यह महादोष है। ऐसे आहार का सर्वचा त्याग करना चाहिये । अपरिगत दोष का वर्णन...
तिल चाऊक उपाणोदय चणोदय तुसोदयं अविद्ध त्यं । अण्णं पि य असणादी अपरिणदं व गेहेज्जो ॥७५१॥ .
तिलोदक--तिल जिससे धोए गये हैं, ऐसे पानी को तिलोदक कहते है। उसी को तिल प्रक्षालन भी कहते हैं । नाउलोदय-तंडुल धोया हुया जल, उष्णगोदका--