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________________ ३३८ ] संव्यवहार दोष का स्वरूप---- [ गो. प्र. चिन्तामखि संवरणं किच्चा पदादुमिदि चेलभाजस्थादीरणं । समक्खिय जं देयं संववहरणों हवदि एसो | ७४५ ।। स्वरा से वस्त्र पात्र लाकर अर्थात् भय से आदर से अथवा मनःक्षोभ से वस्त्र पात्रादि लाकर बिना विचार के और अच्छी तरह से देखकर मुनि को जो ग्राहार देना उसको संव्यवहरण दोप कहते हैं । दायक दोष का विवरण -- सूदी सुंडी रोगी मदय सय पिलायाग्यो च । उच्चार पडिदवंत रुहिर वेसी समणि अंग मक्खीया ||७४६ || जो बालक को आभूषणादिकों से सजाती है, उसको दूध पिलाती है और धाय का कर्तव्य करती है, वह आहार दान- प्रयोग्य है । जो मद्यपान लंपट है, जो रोग से ग्रस्त है, जो मृतक को श्मशान में जलाकर आया है और जिसको मृतक सुलक हैं, जो नपुंसक है, जो पिशाचग्रस्त है, अथवा वातादिक से पीड़ित है, जो वस्त्रहीन है अथवा जिसने एक ही वस्त्र धारण किया है, जो मल विसर्जन करके ग्राया है तथा जो मुत्र करके ग्राया है, जो मूच्छित हुआ है, जिसको बान्ति हुई है, जिसके शरीर से रक्त बाहर या रहा है, जो वेश्या अथवा दासी है, जो यायिका है, अथवा जो लाल रंग के वस्त्र धारण करने वाली रक्त पटिका यादिक अन्य धर्मीय संन्यासिका है, जो अंग मर्दन करके स्नान करती है, ऐसी स्त्री और पुरुष आहार देने योग्य नहीं हैं । प्रतिबाला प्रतिबुद्धा घासतो भिरणो च अंधलिया । अंतरिदा व सिगा उच्चस्था ग्रहव पीच्चत्था ||७४७॥ अतिबाला अत्यधिक मूर्ख अथवा वयं से बहुत छोटा ऐसा बालक और बालिका, प्रतिवृद्धा अत्यन्त वृद्धावस्था से पीडित स्त्री-पुरुष, घासत्ती- भोजन करने वाला पुरुष और स्त्री, गर्भिणी- जिसका गर्भ बढ़ा हुआ है, ऐसी स्त्री अर्थात् पांचवें महीने से नौ महिने तक गर्भवती स्त्री गर्भ के बोझ से पीडित होने से प्रहार देने में प्रयोग्य है | after at नेत्र रहित पुरुष और नारी अंतरिता-भीत, पडदा यादि से व्यवहित होकर पुरुष और स्त्री दान देने योग्य नहीं है । जो बैठा है, ऐसा पुरुष और स्त्री आहार देने योग्य नहीं हैं | उच्चस्था-ऊंचे प्रदेश पर खड़े हुए पुरुष और स्त्री तथा नीवस्था निम्न प्रदेश में स्थित स्त्री पुरुष ये श्राहारदार देने में प्रयोग्य हैं । स्त्री
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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