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________________ अध्याय : पांचवां ] [ ३३७ अशन-भात, रोटी सादिक । पानक-दही, दूध आदिक । खाद्य-लड्डुकादिक । स्वाद्य एला, लवंग, कस्तूरी, ककोलादिक ये पदार्थ मेरे लिये भक्ष्य अथवा अभक्ष्य है, ऐसा मन में संशय उत्पन्न होने पर यदि साधु आहार करेंगे तो उनको शंकिलाहार नामक दोष होता है । अथवा पागम में ये पदार्थ भक्ष्य कहे हैं या अभक्ष्य कहे हैं, ऐसा संशय युक्त होकर जो साधु अाहार करता है, उसको शंकित दोष होता है। . .. म्रक्षित दोष का स्वरूप--- ससिगिद्धेरण देयं हत्थे च भायणेरण दवाए। एसो भक्खिद दोसो परिहरि दब्धो सदा मुरिंगरणा ॥७४२॥ धी, तेल आदि स्निग्ध पदार्थ से लिप्त ऐसे हाथ से अथवा स्निग्ध तैलादि से लित ऐसे कड़छी से अथवा पाय से मुनियों को बाहार देना म्रक्षित दोष से दूषित होता है । इस दोष का सुनि सदा त्याग करे । ऐसे आहार में सुक्ष्म सम्मुर्छन जीव उत्पन्न होते हैं। अतः ऐसा आहार त्याज्य है। निक्षिप्त दोष का स्वरूप--- सच्चित्त पुनधि श्राऊ ते हरिदं च बीयतस जीवा । जं तेसिमुवरि ठविदं रिपक्खितं होदि छन्भेयं ।।७४३।। सचित्त पृथ्वी, सचित्त पानी, सचित्त अग्नि, सचित्त वनस्पत्ति, बीज और त्रस जीव द्वीन्द्रिय, वीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय जीवों पर रखा हुन्ना ग्राहार मुनिमो को ग्रहण योग्य नहीं है। सचित्त पृथ्ट्यादिक छह भेद हैं । अंकुर शक्ति योग्य मेंहूँ अादि बान्य को बीज कहते हैं । हरित-अम्लान अवस्था के तृगा, पर्गा आदि को हरित कहते हैं। इनके उपर स्थापन किया हुआ आहार निक्षिप्त दोष सहित होता है । अथवा अप्रासुक ऐसे पृथिव्याक्षिक कार्यों पर रखरखा हुआ याहार मुनियों को अयोग्य है। पिहित दोष का निरूपण---- सच्चित्तरण व पिहिदं अथवा अच्चित्तगुरु गपिहिदं च । तं छंडियः जं पेयं - पिहिदं तं होदि बोधयो ।।७४४।। जो आहारादिक वस्तु सचित्त से ढकी हुई है अथवा अचित्त ऐसे गुरु बड़े बजनदार पदार्थ से ढकी हुई है, वह उसके ऊपर का प्रावरण हटाकर मुनियों को देना वह पिहित दोष है । .. .. ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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