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[ गो. प्र. चिन्तामणि
अनशन तप है । इन सब व्रतों में कुछ व्रतों की विधि हरिवंश पुराण में उद्यापनसार में तथा व्रत तिथि निर्णय में लिखी है तथा कुछ व्रतों को विधि तो प्राप्त भी नहीं है । निकांक्षा अनशन का लक्षण
निःकांक्षोsसो भवेद्भेक्त प्रत्याख्याने गिनीमृतिः ।
प्रायोप गमनेष्यायुरन्त सन्यास कर्मसु ॥७८ ५ ॥
आयु के अन्त में समाधि मरण के समय प्रायोपगमन में भक्त प्रत्याख्यान और इंगिनीभरण करना यह निष्कांक्षा नामक अनशन तप है 1
मरा पर्यन्त चतुविधि आहार का त्याग करना निराकांक्षा अनशन तप है । इस व्रत के मुख्य तीन भेद हैं। भक्त प्रत्याख्यान मरण, इगिनीमरण, प्रायोपगमन मरण | आयु के अन्त समय में जो चारों प्रकार का आहार का त्याग किया जाता है, बहु भक्तः प्रत्याख्यान सरा है, उसका उत्कृष्ट काल १२ वर्ष है, जघन्यकाल अन्तर्मूहूर्त है, मध्यम के अनेक भेद हैं, इस मरण में क्षपक की वैध्यावृत्ति दूसरे साधु कर सकते हैं और आप भी अपनी वैयावृत्ति करता है | इसमें अन्त समय में चतुविध प्रहार के
की मुख्यता है ।
इंगिनी मरण - अन्त समय में चारों प्रकार के आहार का त्याग करके अपनी वैयावृत्ति दूसरे से नहीं कराता है। अपनी शरीर परिचर्या अपने हाथों से ही करता हैं, वह इगिनी सररण है । जिसमें क्षपक अपनी वैयावृत्ति प्राप भी नहीं करता है और दूसरे से भी नहीं कराता है । वह प्रायोपगमन मरण है ।
देहवर्प विनाशाय संयमद्वय सिद्धये !
कुर्यादनशनं लाभसत्काराद्यनपेक्षया ||७८६ ।।
क्षपक लाभ सत्कार यादि की अपेक्षा न करके शरीर के दर्प का विनाश करने के लिये और संयम की सिद्धि करने के लिये करे |
अनशन व्रत से संयम की सिद्धि होती है, शरीर का ममत्व छूटता है, इसलिए ख्याति, पूजा, लाभ की इच्छा न करके अपनी शक्ति अनुसार अनशन नामक तप को अवश्य करना चाहिये ।
मौदर्य तप का लक्षण --
ग्रास होन निजाहाराद्यनाहाराशनं व्रतम् । तपः स्याद वमौदर्यमक्षकक्षदवानलः ॥७८७।।