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अध्याय : पांचयां ]
। ३५५ ग्रास हीन अपने ग्राहार से कम भोजन अत इन्द्रिय कपी पाटबी जलाने को के लिए दवानल' अवमौदर्य तप है ।।
पुरुष का स्वाभाविक पाहार बत्तीस ग्रास प्रमाण है । उनमें से एक ग्रास शादि बीन करो वा सामोव, गर है । यह अवमौदर्य तप इन्द्रिय रूपी अग्नि को जलाने के लिए दावानल है, अर्थात् अवमौदर्य व्रत में इन्द्रियों का निरोध होता है।
उपवासोऽतिमात्रा शनोत्पन्न श्रम दोष हृत् ।। ध्यान स्वाध्याय निद्रात्तिजयार्थमिदं मतम् ।।७८८॥
अतिमात्र भोजन करने से उत्पन्न हुये श्रम दोष का नाम करने वाला उपवास है । और ध्यान, स्वाध्याय के लिए. निद्रा अति को जीतने के लिए यह अवमौदर्य अन माना है।
अतिमात्रा में भोजन करने से अजीर्णादि रोग उत्पन्न होते हैं, उन रोगों का नाशक उपवास है । तथा ध्यान स्वाध्याय की वृद्धि के लिये निद्रा और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिये अवमौदर्य प्रत करना चाहिये । क्योंकि उदर भरकर नहीं खाने से आलस्य प्रमाद नहीं होता है, परिणामों की विशुद्धि होती है । निद्रा पर विजय होती है । इन्द्रियां भी शिथिल हो जाती है, इसलिए ध्यान और स्वाध्याय की वृद्धि होती है । तथा भूख से कम खाने पर अजीर्णादि रोग भी उत्पन्न नहीं होते हैं। यह अवमौदर्य तप इन्द्रियों के स्वेच्छाचार को रोकता है, परिणामों को निर्मल करता हैं । और इससे प्रतिक्रमगा, प्रत्याख्याच, समता, बन्दना, स्तुति और कायोत्सर्ग इन एट नावश्यकों की वृद्धि होती है । वृत्ति परिसंख्यान तप का लक्षण--
निर्वाट गृहाऽऽहार पान दातृषुवतनम् । संख्या तन्नियमो वृत्ति परिसंख्या निजेच्छया ॥७८९
गली, घर, ग्राहार, पात्र, दाता में वृत्ति वर्तना करना संख्या करना अपनी इच्छा से उनका नियम करना वृत्ति परिसंख्या है ।
आज इस मोहल्ला में आहार मिलेगा तो पाहार करेंगे नहीं मिलेगा तो नहीं करेंगे यह बाट परिसंख्यान है । इस गली में इस घर में या इतने घर में आहार मिलेगा तो याहार करूगा यह गृह परिसंख्यान है ।
सान सर्वप्रथम पाली में दाल, भात, दही, लड्डु आदि किसी वस्तु के विशेष का