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। गो. प्र.चिन्तामणि
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नियम लेना पाहार परिसंस्थान है । अाज सुवर्गा, कांसी, पीतल, चांदो, मिट्टी के बर्तन में माहार लूगा ऐसे पात्र विशेष का नियम लेना भाजन परिसंख्यान है। वृद्ध, युवा, कुमार, कुमारिका या दो स्त्रियां, पुरुष विशेष का नियम लेना दात विशेष परिसंख्यान है। इस प्रकार अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए, कपायों का दमन करने के लिये, शरीर के ममत्व को दूर करने के लिये एवं जिनधर्म को प्रभावना के लिये गृह, दाता, आहार विशेष का नियम का स्टिरियान तप है ।
__ इय माशा निराशा यादीनता भावनाप्तये । जात्रयात्रा निमित्तान्न मात्र कांक्षस्य योगिनः ॥७६०॥
शरीर यात्रा के निमित्त मात्र अन्न की आकांक्षा करने वाले योगी के तृष्णा का छेद करने के लिए अदीनता भावना की प्राप्ति के लिए यह वृत्ति परिसंख्यान होता है।
शरीर को रक्षा करने के लिए साधु लोग पाहार करते हैं । उसमें भी तुटणा को नाश करने के लिए प्रदीनतानों की प्राप्ति के लिए ग्रह वृत्ति परिसंख्यान तप किया जाता है। रस परित्याग तप का लक्षण-----
दधि क्षीराऽऽज्यतैलादेः परिहारो रसस्य यः ।। तपो रस परित्यागो मधुरादि रसस्य वा ॥७६१॥ कायकांति मदाक्षेभक्षोभ वारण कारणं । परिहारो रसस्यायं स्पाज्जितेन्द्रिय योगिनः ॥७२॥
दधि, दुध, बृत, तेलादि और गुड़, चीनी आदि मधुर रस का परिहार रस परित्याग तप है यह रस का परित्याग जितेन्द्रिय योगी के काय कातिप्रद मद और इन्द्रिय रूपी हाथियों के क्षोभ के वारण में कारमा है.। . विविक्त शयनासन तप का लक्षप---
विविक्तेऽध्ययन ध्यान बाधवोत्कर जिते । शयनं चाऽसनं यत्तद्विविक्तः शयना सनम् ।।७६३॥ तरु कोटर शून्यागाराऽरामोवी घरादयः ।।
विविक्ताः कामिनीषण्ठ पशुक्षुद्रागि वजिताः ॥७६४॥ .अध्ययन और ध्यान के. बाधाओं के समूह से रहित एकांत स्थान में गो ।
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