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अध्याय : पांचवां ]
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शयन करना बैठना है, वह विविध शयनासन है, तरुकोटर, शून्यागार, उपवन की पृथ्वी पर्वतादि कामिनी, पशु, नपुंसक और क्षुद्र प्राणियों से रहित विविक्तता होती है ।
कामिनी, नपुंसक, पशु, क्षुद्र प्राणियों से रहित, तरूकोटर, शून्यागार, उपवन की भूमि पर्वत आदि विविक्त स्थान है। उस अध्ययन और ध्यान की बाबा के समूह से रहित विविक्त स्थान में शयन करना, बैठना शयनासन तप है ।
कायक्लेश तप का लक्षरण-
सुखोषलालितः कायो नालं सद्ध्यान सिद्धये । क्लेशः क्लेशैर्मतोचितैः ॥७६५॥
तद्द हृदमनं काय
सुख पूर्वक लालन-पोषण किया हुआ शरीर, सद्ध्यान की सिद्धि के लिए. समर्थ्य नहीं होता है, इसलिये जिनेन्द्र कथित उचित क्लेश के द्वारा उस शरीर का दमन करना, अपने अधीन करना, काय क्लेश तप हैं । यहा कारणों के द्वारा शरीर का दमन करता, काय क्लेश तो है, परन्तु तय नहीं है । जिस काय क्ललेश में शरीर के भमत्व के साथ कपायों का दमन होता है, वहीं काय क्लेश तप है । कषाय के आवेश में आकर शरीर का घात किया जाता है, वह तप नहीं है, इसको बताने के लिये प्राचार्य ने मतोचित कहा हैं ।
निर्दयं मर्दनीयोऽयं कायः क्लेशकरः पुरा । चिरं रिपुरिatar: काय क्लेशरतो यतिः ॥७६६॥
यह काय पूर्व में चिरकाल तक शत्रु के समान क्लेश करने वाला है, इसलिये यह काय क्लेश में रत साधु के द्वारा निर्दय होकर मर्दन करना पड़ता है।
यह शरीर अनादिकाल का शत्रु है, इसने पूर्व में सुभे बहुत दुःख दिये हैं। इसलिये यह मर्दनीय है। ऐसा विचार कर काय क्लेश में रत योगी घोर तपश्चरर के द्वारा काय क्लेश करते हैं ।
वीर स्वस्तिक वज्रा जहस्दि शुण्डांशनादयः ।
व्युत्सर्गे शव गोदंड चाव शय्यादयश्च ते ॥७७॥
वीरासन, स्वस्तिकासन, वज्रासन, हस्ति गुण्डाशन, मुतकशय्या, गवासन, दंड शय्या और धनुः शय्यादि से शरीर को क्लेश देना वा इन आसनों से ध्यान करना व्युत्सर्ग रूप कायक्लेश तप है ।