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[ गो. प्र. चिन्तामगिर तपो बाह्यमिदं बाह्यलोकानन्दैक मन्दिरम् । . ... ग्राभ्यन्तर तपः क्षीर सागरेन्दु नभाभ्यहम् ॥७६८।।
बाहा लोको के आनन्द का एक मन्दिर यह वाह्य तप है शीर सागर और अन्द्रमा के समान उज्जवल ग्राभ्यन्तर तप को मैं नमस्कार करता हूँ।
अनशनादि बाह्य तप बाह्य लोगों के प्रानन्द का स्थान है, धर्म प्रभावना का : . भारस है, उसका वर्णन किया । शाब क्षीर समुद्र और .. चन्द्रमा के समान उज्जवल साभ्यन्तर तप को मैं नमस्कार करता हूँ। सान्तरिक मन का नियमन होने में और बाह्य जनों के प्रत्यक्ष न होने वाले तप को ग्राभ्यन्तर तप कहते हैं । प्राभ्यन्तर तपों के भेद. तत्प्रायश्चितं विनयो. यावत्यं . जगन्नुतम् ।
स्वाध्यायो भवेद् व्युत्सों ध्यानं चाभ्यान्तरं तपः ।।७६६।।
प्रायश्चित, विनय, ययावत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान यह तीन जगत में पूज्यनीय आभ्यंतर तप है। प्रायश्चित तप का वर्णन----
येनागो गलति प्रत्नं प्रायश्चितं तदुच्यते । कर्म प्रायोजनस्तस्य चित्तं चैतोहरं यतः ॥१०॥
जिसके द्वारा पुरातन पाप नष्ट होता है, वह प्रायश्चित कहा जाता है, ... अथवा जन प्राय है, अथवा जन प्राय है भन जिनका क्योंकि उस जन के चित्त को हरा करने वाला कार्य प्रायश्चित कहा जाता है।
प्रमाद अथवा अज्ञान जन्य दोषों के निराकर गा करने का नाम प्रायश्चित है । उत्कृष्ट चारित्र धारी वा मानवों को "प्रायः". कहते हैं। और मन को चित्त कहते हैं । अतः मन की शुद्धि करने वाले कार्य को प्रायश्चित कहते हैं, पाथवा पुरातन कर्मों का क्षेत्रग, निर्जरा, शोधन, बावन, निराकरण, उत्क्षेपण, छेदन यह सब प्रायश्चित के नाम हैं। प्रायश्चित के भेद---
अालोचना प्रतिक्रमणोभयानि विवेचनम् । व्युत्सर्गस्तपच्छेद मूल परिहार दर्शनम् ।१८०१३॥