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अध्याय : पांचवां
प्रायश्चित्तस्य भेदाः स्युर्द व तत्र संश्रये । दोषाः यत्प्रमादाद्यराचं तेषां निवेदनम् ||८०२॥
प्रालोचना, प्रतिक्रमण, उभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, मूल, परिहार और श्रद्धान, ये दस प्रायश्चित के भेद हैं। प्रमादादि के द्वारा उत्पन्न दोषों का गुम समक्ष निवेदन करना श्रालोचना है ।
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गुरु को दोषों के निवेदन करने की विधि -
ज्ञात श्रुतरहस्याय प्रशांत स्वांतवृत्तये । अपरिस्त्रावि शस्तैकान्तस्यायैव सूरये ॥८३॥ विनयेनोपसृत्योपविश्य पार्श्वे कृतांजलेः । बाल व गर्हतोऽवनमित्येतत्स्याद्विशुद्धये ||८०४ ॥
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प्राकंपितानुमापितं दृष्ट बादर सूक्ष्मणम् । छन्नं शब्दाकुलं बहू व्यक्त तत्सेवितान्यपि ।।६०५ ॥ दशेत्यालोचनागांस त्याज्यान्यात्म हितैषिणा ।
जोत के रहस्य को जानता है, जिसका मन अत्यन्त अपरिस्वावी है, ऐसे एकांत में दिल आप में बैठकर अपने दोषों की शुद्धि करने के लिए मायाचार वक्रता का त्याग कर विनय से बालकवत् अपने दोषों की यह करने वाले शिष्य के सलोचना होती है । आलोचना के दश दोषों का स्वरूप ---
प्रशति है, जो के वाम पार्श्व
सदा हि साधयत्यायीः परलोक ममायया ॥ ८०६ ॥
आकंपित दोष, प्रमापित दोष, दृष्ट दोष, बादर दोष, सूक्ष्म दोष, दोष, शब्दाकुल दोष, बहु दोष, प्रव्यक्त दोष, तत्सेवी दोष ये दश श्रालोचना के दोष हैं । श्रात्म हितैषी, मानव, इन दोषों को दूर से छोड़ देवे, क्योंकि माया रहित आलोचना करने से ही परलोक की सिद्धि होती है ।
प्राकंपित दोष
aatein प्रायश्चित भोत्येति सूरये ।
पुरोपकरणानां खानमाकंपितं मतम् ||८०७।।
गुरु मुझे अल्प प्रायश्चित देवें, इसलिए महत् प्रायश्वित के भय से गुरु