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[ गो. प्र. चिन्तामरिए को पूर्व में उपकरण प्रादि देकर अनुकम्पा उत्पन्न कराना, याकंपित दोष है। स्थूल दोष.
ग्लानः क्लेशा सहोऽस्म्यल्पं प्रायश्चितं ममार्यले । चेहोषाख्यां करिष्याभोत्यादिः स्यादनुमापितम् ॥५०॥
में रुगण (रोगी) है, बलेश को सहन करने में असमर्थ हूँ, यदि प्राचार्य मुझे अल्प प्रायश्चित देंगे तो मैं अपने दोषों की आलोचना करूगा स्थूल दोष है । सूक्ष्म दोष सुक्ष्म दोष
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. . सुक्ष्मामः कीर्तनं सूक्ष्म दोस्यामि विशोधकः । इति ख्यात्यादि हेतोः स्यात्सूक्ष्म स्थुलोपगृहनम् ।।०६!!
यह साधु सुक्ष्म दोषों को भी कहने वाला है, इस प्रकार की ख्याति पूजा की इच्छा से अल्प वा सूक्ष्म दोषों की अालोचना करना, यह स्थुल का उपगुइन करने. वाला सूक्ष्म दोप है। प्रच्छन्न दोष
दो सतीद्दशे देयं किं प्रायश्चित्त मित्यलम् । प्रश्नः स्वच्छादनेन स्याच्छन्न लज्जाभयादिभिः ॥१०॥
ऐसा दोष हो जाने पर क्या प्रायश्चित्त देना चाहिए, इस प्रकार लज्जादि के वशीभूत होकर अपने दोषों को आच्छादन करना, बन्न दोष है। किसी के द्वारा अपने दोष प्रकाशित करने पर ऐसा दोष मेरे में भी है, ऐसा विचार कर गुप्त रूप से . प्रायश्चित लेना, प्रच्छन्न दोष है । शब्दाकुलित दोष
व्रतिवातधनवाने स्वदोष परिकीर्तनम् । . .. लज्जाय: पाक्षिकादौ यत्तच्छन्दाकुलितं मतम् ॥११॥
लज्जादिक के कारगर अतियों के समूह से याकुल शब्द से युक्त पाक्षिकांदि में जो अपने दोषों का कथन करना, वह शब्दाकुलित दोष माना है।
जिस स्थान में बहुत बतियों का कोलाहल हो रहा है, ऐसे पाक्षिकादि प्रतिक्रमण के सयय में लज्जादि के वशीभूत होकर अपने दोषों का काथन करना, "जिससे आचान स्पष्ट रूप से खुन नहीं सके, इसको पदालित दोष कहते हैं ।
Kitnis
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