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________________ अध्याय : पांचवां ] बहु दोष प्रायश्चित्तमिदं युक्तं न वेत्यल्पतदाशया । बहुसूरि परिप्रश्नो, यावदल्पं स बहिति ।।८१२१॥ यह प्रायश्चित युक्त है या नहीं हैं, इस प्रकार अल्प प्रायश्चिन की आशा से बहुत से प्राचार्यों से पूछना; जब तक अल्प प्रायश्चित हो, वह बहु दोष है। . अव्यक्त दोष स्वसमान ज्ञान तपो वालस्यालोचनं भवेत् । अव्यक्त हीभय प्रायश्चित्त मीत्यादि हेतुतः ।।८१३॥ लज्जा, भय, प्रायश्चित की भीति आदि कारणों से अपने समान ज्ञान, नप, वालक के समक्ष आलोचना करना, अव्यक्त दोष होता है । तत्सेवी दोष माहशो वेत्यसावेव ममागोऽस्मै यदपितम् । तन्ममेति स्वदोषोक्तिरस्मै तत्सेवितं मतम् ॥१४॥ यह मेरे जैसा ही है, मेरे अपराध इसके लिए जो अर्पण किये हैं, वे मेरे हैं, इसलिये अपने दोषों को बहना तत्सेवी दोष माना है । ऐसे गुरु के पास जाकर अपने दोषों की आलोचना करना जो अपने समान अपराधी है, यह तत्सेबी दोष है। अथवा मेरे दोप इसके अपराध के समान है, इसे यह भी जानता है। इसे जो प्रायश्चित मिलेगा, वह मुझे भी युक्त है, इस प्रकार अपने दोषों को छिपाना तत्सेवी दोष है। साऽऽमांगसंगतं यद्वन्नोषधं व्याधिबाधकम् । तथाऽनालोचना शुद्ध नैनो नाशकर तपः ।।१५।। जिस प्रकार ग्राम सहित शरीर को प्राप्त हुई औषधि रोग नाशक नहीं है, अर्थात् जो औषधि अपक्व है, वह रोग नाशक नहीं हैं। उसी प्रकार पालोचना से अशुद्ध तप पापों का नाशक नहीं है । निर्दोष तप ही पापों का नाशक है। मुनि की और प्रायिकाओं की आलोचना--- द्वयाश्रयं संयतानां स्यादायिकाणां त्रिगोचरम् । सप्रकाश प्रदेशे तु तच्चारित्र विभूषणम् ॥१६॥ नियों की आलोचना (दोषों का कथन) दो के आश्चय से होती है । अर्थात्
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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