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[ गो. भ. चिन्तामशिा
यदि मुनि अपने दोषों की आलोचना एकांत में गुरु और शिष्य दो हो, तब करे । तीसरा समीप नहीं होना चाहिये । प्रायिकाओं की पालोचना प्राचार्य गणिनी, और अालोचना करने वाली नायिका, इन तीन के प्रनित होती है। अर्थात् अकेली प्रायिका एकांकी प्राचार्य के पास आलोचना नहीं करती है । प्रायिका सूर्य से प्रकाशित प्रदेश में आलोचना करती है । अन्धकारिता प्रदेश में नहीं करती है । यह अालोचना चारित्र का भुषगा है।
पालोच्यापित प्रायश्चित वृत्ति विजितः ।। सन्मंत्र . निश्चयेऽप्युद्योगो नवकलजितः ।।८१७॥
जो मुनि पालोचना करके भी प्राचार्य के द्वारा अपित प्रायश्चित का प्रावरण नहीं करता है। वह सन्मंत्र का निश्चय करके भी उद्योग नहीं करने वाले के समान फल रहित होता है। जैसे मंत्र को जान करके भी जो मंत्र की विधि का अाचरण नहीं करता है, उसको मंत्र के फल की प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार आलोचना करके भी प्राचार्य कथित प्रायश्चित को पालन नहीं करने वाला निर्दोष . नहीं होता है।
मिथ्यामदाऽगोऽस्त्वि त्याद्य यं घोषेभ्यो निवर्तनम् । .. प्रतिक्रमण मल्पा , पराधस्यकाकिनो मुनेः ॥८१८॥
मेरे अपराध मिथ्या होद इत्यादि वचनों के द्वारा जो दोषों से निवर्तन है. .. वह अल्प अपराधी एकाकी मुनियों के प्रतिक्रमण है। उभय प्रायश्चित का स्वरूप
स्यातदुभयमालोचना प्रतिक्रमणद्वयं । दुःस्वप्न दुष्ट चितादिमहा दोष समाश्रयम् ॥
आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों किये जाते हैं, वह उभय नामक प्रायश्चित है । मुनिराज दुःस्वप्न मानसिक दुष्ट विचार, चितादि महादोग उत्पन्न होने पर - प्रतिक्रमग और आलोचना दोनों करते हैं । विवेक प्रायश्चित का स्वरूप---- . . . .
परिहत्तु मशक्तस्य दोषं द्रव्यादि संश्रयम् । - तद्रव्यादि परित्यागो विवेकः कथितोऽथवा ॥१६॥