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________________ अध्याय : पांचवां ] अनासुकस्थ्य सेवायां त्यक्तस्य प्रासुकस्य च । प्रमादेन पूनः स्मृत्वा स तदा तद्विसर्जनम् ।।२०॥ द्रव्यादि से संश्रित दोष को छोड़ने में अशक्त के उस द्रव्यांदि का परित्याग करना विवेक बहा है, अथवा प्रमाद से अनासक का और त्याग किये हुये प्रासुक द्रव्य . का सेवन करने पर पुनः स्मरण करके उसका त्याग कर देता है, तब वह विवेक नामक प्रायश्चित होता है । जो वस्तु अप्रामुक का अभक्ष्य है, अथवा जो छोड़ी हुई है, प्रमाद से या विस्मरगा से उस वस्तु का सेवन कर लिया हो लो तदनन्तर स्मरण होने पर उसको छोड़ देना, विवेक नामक प्रायश्चित है । अथवा जिस वस्तु के सेवन करने से काम क्रोधादि विकृति उत्पन्न होती है, उस वस्तु का त्याग करना विवेक नामक प्रायश्चित है । अथवा जिस वस्तु में अभक्ष्य वा छोड़ी हुई वस्तु मिली है, उसको पृथक् करना शक्य नहीं है, उस वस्तु का त्याग करना भी विधक है । व्युत्सम का स्वरूप-- युत्समोश रहताधिकार काय जनम । सद्ध्यानं तन्मलोत्सर्ग नद्या तरणादिषु ॥२१॥ मल, मूत्र यादि का त्याग करने के बाद, नदी आदि से पार होने के बाद अन्त हीदि काल पर्यन्त शरीर के ममत्व का त्याग करके सध्यान वरना तप प्रायश्चित्त का स्वरूप तपः स्यादुपवासक स्थानादि व्यसनादिभिः । ब्रतातिचारे सत्येतत्प्रायश्चितं तु षड्विधम् ।।२२।। व्यसन आदि के द्वारा बतों में अतिचार हो जाने पर उपवास, एक भुतिः नादि छह प्रकार के बहिरंग तप करना, यह तप नामक प्रायश्चित है ।। अहिंसादि ब्रतों में अतिचार लग जाने पर अनशनादि छह प्रकार बहिरंग तप के द्वारा आत्म शुद्धि करना तप नामक प्रायश्चित है। छेद का स्वरूप-- दिवसादि तपच्छेदश्छेद संयम पर्यये । सदर्पकृत दोषस्य चिर दीक्षा हितैषिणः ।।८२३॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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