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________________ ३६४ ] [ गो. प्र. चिन्तामगि अभिमान में पाकर किया है, दोष जिसने चिरकाल की दीक्षा हितैषी .. के संयम की पर्याय में दियस अादि तप का छेद करना छेद नामक प्रायश्चित है। . चिरकाल. का दीक्षित साधु अभिमानी होकर अपने मतों में दुपरा लगाता है, तब उसकी पक्ष, मास, दिवसादि की दीक्षा का छेद कर देना छेद नामक प्रायश्चित है। पुनर्दीक्षा ग्रहोनूनं जा पूपिशिशिरू : छित्वोन्मार्गस्थ पार्श्वस्थ प्रभृतिश्रमणेत्वियम् ।।८२४॥ सारी पूर्व की तपस्थिति को नष्ट कर पुनः दीक्षा का ग्रहण करना मूल नामक प्रायश्चित है, यह प्रायश्चित उन्मार्गगामी, पार्श्वस्थ प्रभृति महादोषी श्रमणों में होता है। पूर्व की सम्पूर्ण तपस्थिति का छेद करके पुन: दीक्षा देना मूल नामक प्रायश्चित है । यह प्रायश्चित उन्मार्गगामी, पार्श्वस्थ अादि महादोषी श्रमणों को ही दिया जाता है। पार्श्वस्थ आदि मुनियों के भेद--- सच्चारित्रामृतापात्रं स्युः पार्श्वस्थः कुशीलकः । संसक्तोऽप्यवसन्नश्च मृगचारीति पंचते ।।८२५॥ पार्श्वस्थ, कुशील, संसक्त, श्रबसन्न और मृगचारी ये पांच प्रकार के मुनि सम्यकचारित्र के पात्र नहीं है । पार्श्वस्थ और कुशील वसत्युपधि संगस्थः पावस्थः स्यात्कुशीलकः । संघाहित फरस्तीन कषायो व्रत जितः ।।८२६।। पार्श्वस्थ-जो वसतिका, उपाधि और परिग्रह. में स्थित है—वह मुनि पार्श्वस्थ ऋहलाला है। ... कुशील-जो सर्व संध का अहितकर है, तीव्र कमायी है. बतों से रहित हैं, वह साधु कुशील कहलाता है । .: संसक्त और अयसन्न - संसक्तो वैद्य मन्त्रावनीश सेवनादि जीवनः ।. ज्ञान चारित्रहीनोऽवसनः स्यादकरलालसः ।।८.२७॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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