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________________ अध्याय : पांचवां ] [ ३६५ Minisiridinnetwount admanarain winnaginni संसक्त--जो लोग कपाय के वशीभूत होकर औषधि, मन्य, तन्नादि बताकर अजीविका करता है और राजा आदि की सेवा करता है, वह साधु संसक्त कहलाता है। अबसन्न-जो ज्ञान चारित्र से रहित है । साधु की दैनिक क्रियाओं में आलसी है, वह अबसन्न कहलाता है । मुगाचारी स्वच्छंदो यो गणं त्यक्तु चरत्येकाक्यसंवृतः । मृगाचारीत्यमी जैन धर्माऽकोत्तिकरानराः ।।८२८॥ । मगाचारी-जो साधु स्वछन्द है, अर्थात् प्राचार्य की प्राज्ञा का विराधक है। संघ को छोड़कर एकाकी असंवृत्त होकर नमरण करता है, यह जन धर्म को मलीन करने वाला साधु मृगाचारी है ।। परिहार उपस्थापना प्रायश्चित के भेद---- परिहारोऽनुपस्थापन पारंभिक भेद भाक् । निजान्य गणभदं तत्राद्य तत्राद्यमुत्तमम् ।।८२६॥ अनुपस्थापन और पारंत्रिक के भेद से परिहार दो प्रकार का है। उसमें अनुपस्थापन, जिनगा अनुपस्थापन और अन्यगरण अनुपस्थापन के भेद से दो प्रकार का है। उसमें निजगरा अनुपस्थापन उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से तीन प्रकार द्वादशाब्देशु षण्मासण्मासातशनं मतम् । जघन्यं पंच पंचोपवास मध्यन्तु मध्यमम् ।।८३०॥ बारह वर्षों में छह-छह महीने का उपवास करना उत्तम है, वारह वर्ष तक पांच-पांच उपवास करना जघन्य और मध्यम है । अनुपस्थान प्रायश्चित---- द्वात्रिशदूरालयस्थेन वसतेयतीन् । सर्वान् प्रणमताऽपेत प्रतिवन्दन साधुना ॥३१॥ स्वदोष ख्यातये पिच्छं विभ्राणेन पराङ मुखं । सूरीतरैः सहोपात्रमौनेनैतद्विधीयते ॥३२॥ जो प्राचार्य वा संघ की वसलिका से बत्तीस धनुष दूर स्थान में रहता है और सर्व मुनियों को नमस्कार करता है, परन्तु उसको कोई मुनि प्रतिनमस्कार नहीं
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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