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________________ [ गो. प्र. चिन्तामगि करते हैं। जो प्राचार्य के साथ वार्तालाप करता है, शेप मुनियों और थावकों के साथ नहीं बोलता है, मौन रखता है । अपने दोषों की बिख्शाति (प्रगटता) के लिये पिच्छिका को पराङ मुखी रखता है, छह महीना, पांच महीना ग्रादि का उपवास करता है, यह अनुपस्थान नामक प्रायश्चित है । स्वगग अनुपस्थापन प्रायश्चित देने के कारण प्रमादे नान्य पाखंडि गृहस्थ यति संश्रितं । वस्तुस्तेनयतः किचिच्चेतना चेतनात्मकम् ।।८३३॥ यतीन्प्रहरतोऽन्य स्त्रीहरणादींश्च कुवर्तः । दश नव पूर्वज्ञस्य व्याय संहननष्य यत् ।।८३४॥ प्रमाद के कारण अन्य पाखंडी गृहस्थ और यतियों से संचित चेतनअचेतनात्मक किचित वस्तु की चोरी करने वाले यति को, मारने वाले पर स्त्री हरगण आदि पाप करने वाले को नव और दश पूर्व के पाठी तथा प्रादि वनवृषभ वज्र और नाराच वाले को बह परि कथित स्वगग्णानुपस्थापन प्रायश्चित दिया जाता है । करोति यदि दर्पण दोषान् पूर्व भाषितान् । सोयमन्यगणानुपस्थापनेन विशुद्धयति ।।८३५।। जो यति नव या दश पूर्व का पाठी हो, आदि के तीन संहनन (ब्रज वृषभ ... · नारांच, ब्रज नारांच, नारांच) से युक्त हो - परानु प्रमाद के वशीभूत होकर पाखण्डी, यति, गृहस्थादि को चेतना चेननात्मक वस्तु की चोरी की है, क्रोध में पाकर किसी यति का घात किया है, तथा पर स्त्री का सेवन किया है, तो वह मुनि स्वगणानुपस्थापन नामक प्रायश्चित का भागी होता है। हीन संहनन बाले को यह प्रायश्चित नहीं दिया जाता है। जो यदि पूर्वोक्त हिंसादि दोष को अभिमान में प्राकर करता है तो वह साधु .. अन्यगरणानुपस्थापन नामक प्रायश्चित के द्वारा शुद्ध होता है । · अन्यगणानुपस्थापन नामक प्रायश्चित का लक्षण प्रायश्चितं तदेवात्र किन्तु स्वगरण सूरिणा। पालोच्य प्रेषितः सप्त सूरि पावमनुक्रमात् ।।८३६।। मालोच्य संस्तैर प्राप्त प्रायश्चित्तोऽन्त्य सूरिया । तमाद्य प्रापितस्तेन दतं चरति पूर्ववत् ।।८३७॥ Skincareonema. maline
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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