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अध्याय : पांचवां ]
गान्य गणानुपस्थागत लामक याचिका की विधि । अनुपस्थापन के समान हो है। परन्तु यह विशेषता है । अभिमान पूर्वक अपराध करने वाला साधु अपने दोषों की प्राचार्य के समक्ष आलोचना करता है । तदनन्तर उसकी आलोचना को सुनकर प्राचार्य उसको दूसरे प्राचार्य के समीप भेजते हैं । वह साधु दूसरे प्राचार्य के समीप जाकर अपने दोघो की आलोचना करता है, वह प्राचार्य भी उसकी आलोचना मुनकर तीसरे श्राचार्य के समीप भेजते हैं। इस प्रकार साात प्राचार्य के समीप जाकर अालोचना करता हैं, उसको कोई भी प्राचार्य प्रायश्चित नहीं देते हैं । पुनः कम से सात प्राचार्यों के पास जाकर अपने प्राचार्य के समीप पाता है । तब ग्राचार्य उसको स्वगगणानुस्थापन विधि के अनुसार प्रायश्चित देते हैं। यह अन्यगणानुस्थापन नामक प्रायश्चित है स्वगणानुस्थापन का अर्थ है- अपने गण से बहिस्कृत करना । अपने संघ की वसतिका से ३२ धनुष दूर रखना । अन्यगरणानुस्थापन का अर्थ है - दूसरे प्राचार्य के संघ में जाकर आलोचना करने पर भी प्रायपिचत देकर वे प्राचार्य साधु को अपने गण में नहीं रखते हैं, इसलिये यह अन्यगरणानुस्थापन है । पारंचित प्रायश्चित को विधि-- .
स्वधर्म रहित क्षेत्रे प्रायश्चिते पुरोदिते । चारः पारंचिकं जैनधर्मात्यन्तरतेर्मतम् ।।८३८।। संघोझेश विरोधांतः पुरस्त्री गमनादिषु । दोषेष्ववंद्यः पाप्येष पातकोति बहिः कृतः ।।६३६॥ चतुविधेन संधेन देशानिष्कासितोप्यदः । चरत्येवाऽर्य वैराग्य सत्त्वज्ञान बलो वती ।।८४०।।
अपने धर्म से रहित क्षेत्र में पूर्व में कहे हुये प्रायश्चित में जैन धर्म में अत्यन्त लीन मुनि का बिहार पारंचिक नामक प्रायश्चित माना है, संघ का राजा का, विरोध, अंतःपुर की स्त्री गमनादि दोष हो जाने पर यह अबंदनीय है पापी है पातकी है, इस ग्रकार बहिष्कृत तथा चतुर्विध संघ के द्वारा देश से निकाला हुआ भी यह श्रेष्ठ वैराग्य, तत्वज्ञान रूपी बल से युक्त साधु पाचरगा करता है।
.. इस प्रायश्चित में उपवासादि विधि तो अनुपस्थापन प्रायश्चित के समान है, परन्तु कुछ विशेषला है ! जब कोई साधु संघ का, राजा का विरोधी होकर अंतःपुर की
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