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[ गो. प्र. चिन्तामणि स्त्रियों के साथ दुराचार करता है, तब अनेक महापराध करने पर चातुर्वर्ण्य श्रम संघ से यह महापापी है, जिनमत से वाह्य है, 'इसको बन्दना मत करो' ऐसी घोषणा देकर अनुपस्थापना नाम प्रायश्चित देकर देश से निकाल देते हैं। यह मुनि भी स्व धर्म सहित क्षेत्र में जाकर ज्ञान, वैराग्य, सत्य, कार में अन्न होकार, मानार्य के द्वारा दिये . हुए प्रायश्चितः का पालन करता हुया विहार करता है, यह पारंचिक नामक प्रायश्चित है।
दर्शनं यत्युनस्तत्व श्रद्धानं तन्महावतैः । साद्धं यतेः स्थितस्येत्वा मिश्वात्वं तदुदीरितं ।।८४१॥
किसी कारण से मिथ्यात्व अवस्था को प्राप्त हुआ मुनि पुनः तत्वश्रद्धान को. प्राप्त होता है, वह दर्शन नामक प्रायश्चित है।
देशं कालं बलं ज्ञात्वा गणी वैद्यवदंगिनाम् । अल्पानल्पेषु दोषेषु कुर्यात्त द्विशोधनं ॥८४२॥
जिस प्रकार वैद्य रोगी के रोग शक्ति प्रादि को जानकर उसके रोग को दूर करने के लिए औषधि देता है उसी प्रकार प्राचार्य साधु के अल्प अनल्प दोषों में देश, कारन, शक्ति को जानकर प्रायश्चित देकर उसके दोनों की शुद्धि करते हैं।
कृतागसैव कर्तव्य प्रायश्चित त्रिशुद्धितः । ग्लानस्यैव प्रयत्नेन युक्तमौषध सेवनं १८४३।।
जिस प्रकार रोगी को प्रयत्न पूर्वक औषधि सेवन करना चाहिए । इसी . ... प्रकार किया है, अपराध जिसने ऐसे साधु को मन, वचन, काय से प्रयत्न पूर्वक युक्त
प्रायश्चित करना ही चाहिए। . : ... जिस प्रकार रोगी मानव योग्य पोषधि सेवन करके रोग दूर करता है।
उसी प्रकार अपराध रूपी रोगों को दूर करने के लिये मन, वचन, काय की शुद्धि पूर्वया.. प्रयत्नशील मुनि को अपने दोपों को गुरु के समक्ष आलोचना करके प्रायश्चित ग्रहण करना चाहिये । औषधि सेवन किये बिना रोगों का निष्कासन नहीं होता । उसी प्रकार प्रायश्चित के बिना पायों का प्रक्षालन नहीं होता है ।
'दोषव्युदासनैः शल्य मर्यादा संयम स्थितिः । स्वांत प्रशांति सम्पत्ति प्रमुखार्थ मिदं मतम् ॥८४४॥