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________________ .auni m printam-yourt अध्याय : पांचवां । [ ३६६ प्रायश्चित नामक तप के द्वारा शल्य (माया, मिथ्यात्व और निदान) का नाश होता है । मर्यादा संयम की स्थिति होती है । चित्त की शांति और दोष कृत पापों का प्रक्षालन होता है । इसलिये प्रायश्चित नामक तप का वर्णन किया है ! बिनय लप का वर्णन विनयं स्याद्विनयनं कषायेन्द्रिय मर्दनं । स नीचैर्वत्ति रथवा विनयाहे. यथोचितम् ।।४५॥ विनयते इति विनयनं, विनयन किया जाता है कषाय का और इद्रिय का दमन किया जाता है, अथवा पूज्य पुरुषों के यथा योग्य नम्रता होती है उसकी विनय कहते हैं। सरज्ञान तपश्चारित्रोपचार प्रपंचकः । तनविनयस्त्यागः शंकादीनाम मीचते ।।८४६।। सम्यग्दर्शन विनय, सम्यग्ज्ञान विनय सम्यक्चारित्र विनय तपो विनय और उपचार विनय के भेद से पांच प्रकार का विनय है। उसमें शंकादि दोषों का परिहार करना सम्यग्दर्शन विनय है । दर्शन विनय का लक्षण शंकाऽऽकांक्षा जुगुत्साऽन्हा प्रशंसन संस्तवाः । नाम्ना ज्ञेयास्त्रयोन्स्यौ तु मनोवाविषये स्तुती ।।८४७॥ जिनेन्द्र कथित तत्त्व में संशय करना शंका है। संसारिक भागों की याँछा, कांक्षा है, रत्नत्रयधारी दिगम्बर तपस्वियों के शरीर को देख कर ग्लानि करना भूख प्यास से पीड़ित होकर जैन तपश्चरण से निर्विधन होना जुगुप्सा है। मन के द्वारा मिथ्यादृष्टियों की स्तुति करना संस्तब है । ये पांच सम्यग्दर्शन के अतिचार हैं । इनसे सम्यग्दर्शन मलीन होता है इसलिये इनका त्याग करना चाहिये । इन अतिचारों का त्याग करना सम्यग्दर्शन का विनय है । ज्ञान विनय का लक्षरप--- द्रव्यादि शोधनं वस्तु प्रमाणावग्रहादिक । . . बहुमानः श्रतज्ञेषु अताज्ञासायनोभनं ।।८४८।। धयः शील श्रुतोनाधिकाध पाध्याय कीर्तनं । चानिन्हवेन येनायज्ञानावरणकारणं ॥८४६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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