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________________ ३७० स्वराक्षर पद ग्रन्थार्थी हीनान्ययनादिकं । स्याज्ज्ञान विनयः सम्यग्ज्ञान स्वर्मोक्ष कारणम् ॥८५०॥ यदि का शोधन वस्तु की संख्यादिका अवग्रहादि श्रुतज्ञानियों में बहुमान श्रुत ज्ञानियों के प्रासादन का त्याग निवरहित वय से न्यून और शील श्रुत से अधिक उपाध्याय यादि का कीर्तन जिस कारण से यह निन्हव ज्ञानावरण कर्म कारण है । स्वर, अक्षर, पद, ग्रन्थ, अर्थ को हीनाधिक नहीं पढ़ना यह सम्यग्ज्ञान स्वर्ग और मोक्ष की कारणाभूत ज्ञान है। 8 ज्ञानाचार अधिकार में कथित द्रव्य क्षेत्र काल और भाव की शुद्धि से शास्त्र पढ़ना, वस्तु प्रमाणादिका अवग्रह करना, श्रुतज्ञानियों में बहुमान होना, श्रुतज्ञानियों की आसान नहीं करना, उम्र में हीन होते भी जो शील और श्रुत में अधिक उपाध्याय यादि के गुणों का उत्कीर्तन करना जिस गुरु से ज्ञानार्जन किया है वह श्रुत आदि में हीन हो तो भी उसका नाम बताना, ज्ञानावरणादि कर्मों के कारण भूत निन्दु का त्याग करना, अर्थात् अपने श्रुतज्ञान को नहीं छिपाना, शब्द शुद्ध पढ़ना, ये ज्ञान के विनय हैं। तपो विनय का लक्षण - [ गो. प्र. चिन्तामणि rates क्रिया शक्तिर्नानोत्तर मुणोन्नतिः । तपस्तद्वत्तमोदश्च स्यात्तपो विनयो मुनेः ||८५१॥ आवश्यक क्रियाओं में श्रासक्ति नाना उत्तर गुणों की उन्नति तपवालों में प्रमोद होना जिससे तपो विनय होता है । निर्दोष श्रावश्यक क्रियाओं का पालन करता नाना प्रकार के उत्तर गुणों की वृद्धि करना, बारह प्रकार के तपश्चरण में और तपस्वियों में प्रमोद भाव रखना. तपो विनय है । चारित्र विनय का लक्षरण --- भक्तिश्चारित्रवत्स्वत्य वृत्ताऽनिन्दनमुद्यमः | परीबह जयादी च चारित्र विनयो मुनेः ॥६५२ ॥ ॥ चारित्र शाली मुनि हंसों के प्रति भक्ति करना अन्य व्रतियों अर्थात् जयन्ध चारित्र वाले की निन्दा नहीं करना परिषद् आने पर उन पर विजय प्राप्त करने के लिये तत्पर रहना यह चारित्र विनय है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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