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________________ अध्याय : पांचवां । . .. minationsaninetrina उपचार विनय का लक्षण और उसके भेद--- उपोपसत्य यश्चार उपचारो यथोचितः । स प्रत्यक्ष परोक्षात्मा तत्रायः प्रतिपाद्यते ॥८५३॥ समीप में जाकर जो यथोचित सत्कार किया जाता है वह उपचार विनय है। वह उपचार विनय प्रत्यक्ष और परोक्ष के भव सं दो प्रकार का है। इसमें सर्व प्रथम प्रत्यक्ष विनय का वर्णन करते हैं। प्रत्यक्षविनय का लक्षण-- अभ्युत्थानं मतिः सूरायागच्छति सति स्थिते । स्थानं नोचं निविष्टेऽपि शयनोच्चासनोसनम् ।।८५४॥ गच्छत्यनुगमो वक्तर्यनुकूलं वचो मनः । प्रमोदोत्यादिकं चैव पाठकादि चतुष्टये ॥५५॥ प्राचार्य के गाने पर शीन ही आसन से उठकर खड़े होना चाहिये तथा भक्ति पूर्वक उनको नमस्कार करना चाहिये । आचार्य के बैठ जाने पर प्राचार्य से नीचे स्थान पर बैठना चाहिये । प्राचार्य के सामने गायन और उच्चासन को छोड़ना चाहिये। प्राचार्य के गमन करने पर उनके पीछे पीछे चलना चाहिये । प्राचार्य के बोलने पर अनुकूल बचन बोलना चाहिये तथा प्राचार्य के प्रति मन में प्रमोद भाव, उनके गुरगों में अनुशग होना चाहिये । प्राचार्य के समान ही उपाध्याय, गगणधर, स्थावर और प्रवर्तक का विनय करना चाहिये । प्राचार्यदिवसत्स्वेवं स्थाविरस्य भुने गुणे । प्रतिरूपकाल योग्या क्रिया चान्येषु साधुषु ।।८५६।। प्राचार्य की अनुपस्थिति में स्थविर, गणधर और अन्य साधुनों में प्रति रूप काल योग्य क्रिया नहीं करना चाहिये। आर्यादेशयमाऽसंग्रतादि पचितसस्किया । कर्तव्या चेत्यदः प्रत्यक्षोपचार लक्षरणम् ।।८५७।। ग्रायिका, देश संयमी और असंयतादि में उचित सत्कार करना चाहिये । यह प्रत्यक्ष उपचार विनय है । परोक्ष विनय का लक्षरए ---- ज्ञान विज्ञान सत्कीतिर्नति राज्ञानुवर्तनं । परोक्षे परगनाथाना परोक्ष प्रश्रयः परः ॥८५८।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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