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। गो. प्र. चिन्तामरिंग परोक्ष में प्राचार्य के ज्ञान विज्ञान का सत्कीर्तन, प्राज्ञा का पालन और नमस्कार परोक्ष विनय है।
विनयेन बिहीनस्य भिक्षोः शिक्षामृतश्रियः । संश्रयाय निदानं नो तथा चाभ्युदय श्रियः ॥८५६॥
जो तपस्वी विनयहीन है अर्थात् गुरुजनों का विनय नहीं करता है उसका शास्त्राध्ययनादि मुक्ति की प्राप्ति तथा स्वर्ग श्री का कारण नहीं है । विनय करने से क्या होता है.----
जिनाज्ञावर्त्तनं क्रीति मैत्री मानापनोदनम् । गुरपानुरागिता संघ सम्मवा धाश्च तद्गुणाः ।।८६०॥
जिनेश्वर की यो का पालन, हीति, निता, पान काप को हानि, गुरगों में अनुराग और चतुर्विध संघ को सन्तोषादि विनय के गुरण हैं।
विनय से जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा का पालन होता है, जगत में निर्मल सत्कोति रूपी लता विस्तरित होती है सर्वजनों के मैत्री भाव प्रगट होता है, मान कपाय का नाश होता है तथा चतुर्विध संघ विनय शील मानव पर सन्तुष्ट होता है इत्यादि अनेक विनय के गुण हैं ।
किमत्र बहुनोक्तेन पदं सर्वेष्ट सम्पदाम् । रत्नत्रयी विभूषायां चेन मुक्ति निबन्धनं ।।८६१॥
विशेष कहने से क्या प्रयोजन है बिनय सर्व इष्ट सम्पदाओं का स्थान है, रत्नत्रय का भुपरण है और मुक्ति का कारण है। वैयावृत्य का लक्षण
व्यापत्प्रतिक्रिया यावृत्यं स्यात्सूरिपाठके । तपपस्विक्ष्यिग्लानेषु गणे संघे कुले यतौ ।।८६२६॥ मनोज्ञे च तपस्येषु नानाऽनशनवर्तनः । शैक्षो ज्ञानादि संशिक्षो ग्लानो नागागदातितः ॥८६३३॥ गणः स्थविर सन्ताश्चातुर्वर्ण्यकदम्बकम् । संघः स्याछीक्षकाचार्य शिष्याम्नायः कुल मतम् ।।८६४॥ चिर प्रवजितः साधुर्यतिः शेषो हि संयमी । दोक्षोन्मुख मनोज्ञाख्योऽसंयतो वा. सुदर्शनः ।।८६५॥