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- अध्याय : पाचन
[ ३७३ विद्याजात्यादि विख्यातो मिथ्यादृग्वाऽस्य संग्रहः । जिन प्रवचनस्यायं लोके गौरव कारकः ।।८६६॥ ।
सम्यग्नर्शनादि गुणों के आधार भूत महापुरुष से भव्य जीव स्वर्ग, मोक्ष सुख .. दायक व्रतों को धारण कर आचरण करते हैं, वे प्राचार्य हैं।
जिन व्रत शील भावनाशाली महानुभाव के समीप जाकर भव्यजन विनयपूर्वक श्रुत का अध्ययन करते हैं, वे उपाध्याय हैं ।
मासोपवास प्रादि नाना तपों को तपने वाले तपस्वी हैं। श्रुतज्ञान के शिक्षण में तत्पर और सतत ब्रत भावना में निपुण शैक्ष है। जिनका शरीर रोगों से प्राक्रान्त हैं, वे ग्लान हैं। स्थविरों की संतान गण हैं। दीक्षा देने वाले प्राचार्य की शिष्य परम्परा कुल है। चतुर्वगा श्रमरणों के समूह को संघ' कहते हैं। चिरकाल के दीक्षित पुराने साधक साधु हैं ।।
अभि रूप को मनोज कहते हैं। अथवा लोक में जो विद्वान है वाग्मी है, महाकुलीन आदि जाति से प्रसिद्ध है, जिनका संघ में रहना प्रवचन गौरव का कारण है उसको मनोज्ञ कहते हैं । अथवा जो संस्कार सहित सुसंस्कृत असंयत सम्यग्दृष्टि हैं, बह भी मनोज्ञ हैं । इस ग्रन्थ में विद्या जाति आदि से विख्यात जिन धर्म की प्रभावना करने वाले भद्र परिमगामी मिथ्यादृष्टि को भी मनोज्ञ में ग्रहण किया है । इनकी आपत्ति दुर करना वैयावृत्ति है।
परिषह समाश्लेषेऽभीषां थपछेमुषीसुदः । संपादनं त्रिरत्नाप्यैः वैयावृत्य त्रिशुद्धितः ।।८६७॥ प्रावासान पाना: प्रासुकैः क्लेशनाशिभिः। . तदभावे स्वकायेन स्वोपकारानपेक्षया ॥८६८।। । विण्मूत्रश्लेष्म सिंघारण कादे देहाद पोहतात् । ..
यत्नेनोत्क्षेयनिक्षेप परिवर्तक्रियादिभिः ।।६।।
इन मुनियों पर, व्याधि, परीषह, औषधि, ग्रादि उपद्रव होने पर उनका प्रामुक .. पाहार, पान, प्राश्रय, आसन, पावास, धौंपकरण आदि से प्रतिकार करना तथा संयम, सम्यक्त्वादि से च्युत होने पर उनको संयम और सम्यक्त्व मार्ग में दृढ़ करना ।
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